राजस्थान इतिहास के स्रोत : आज की इस पोस्ट में राजस्थान के इतिहास के विभिन्न स्रोतों (Sources of History of Rajasthan) से सम्बंधित महत्वपूर्ण लेख लिखा गया है। इसमें आप सभी द्वारा अक्सर पूछे जाने वाले सवाल - राजस्थान का इतिहास बुक, आधुनिक राजस्थान का इतिहास, राजस्थान का इतिहास GK Question in Hindi, राजस्थान के इतिहास के प्रमुख स्रोत PDF Download, राजस्थान के इतिहास के स्रोत Trick PDF Download, राजस्थान के इतिहास का सर्वेक्षण, राजस्थान का सांस्कृतिक इतिहास पुस्तकालय संग्रहालय शिलालेख अभिलेख, राजस्थान के इतिहास के साहित्यिक स्रोत ताम्र पत्र स्रोत मुद्राशास्त्र स्रोत स्थापत्य स्रोत आदि से सम्बंधित महत्वपूर्ण जानकारी दी गयी है। आप सभी इसको पूरा जरूर पढ़ें:- 
राजस्थान के इतिहस के स्रोत - Sources of History of Rajasthan in Hindi
राजस्थान के इतिहास के स्रोत

पुरातात्विक स्रोत (Archaeological Sources)

अभिलेख (Epigraph) - 

विभिन्न महत्वपूर्ण अभिलेखों से महत्वपूर्ण तिथियां, विभिन्न शासकों की वंशावली, विजय, दान, शासकीय नियम, उपलब्धियां, सामाजिक नियमाली तथा विशेष घटनाएं आदि की जानकारी मिलती है। महत्वपूर्ण अभिलेख निम्न प्रकार है:-

घोसुण्डी शिलालेख -
यह शिलालेख नगरी (चित्तौड़गढ़) के निकट घोसुण्डी गाँव में प्राप्त। इस शिलालेख में ब्राह्मी लिपि में संस्कृत भाषा में द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व के गजवंश के सर्वतात द्वारा अश्वमेघ यज्ञ करने एवं चारदीवारी बनाने का उल्लेख है। घोसूंडी का शिलालेख सर्वप्रथम डॉ. डी.आर. भंडारकर द्वारा पढ़ा गया। यह शिलालेख राजस्थान में वैष्णव (भागवत) सम्प्रदाय से सम्बंधित प्राचीनतम अभिलेख है। 

नगरी का शिलालेख - 
नगरी (चित्तौड़गढ़) से उत्खनन में डॉ. डी. आर. भण्डारकर को प्राप्त एक लेख जिसमें नागरी लिपि में एवं संस्कृत भाषा में विष्णु पूजा का उल्लेख है। यह अजमेर संग्रहालय में स्थित है।

अपराजित का शिलालेख - 
यह शिलालेख नागदां गाँव के कुंडेश्वर मंदिर में मिला था, जो 661 ई. का है। इस शिलालेख में गुहिल वंश के तेजस्वी राजा अपराजित की विजयों एवं प्रताप का वर्णन है। 

मंडोर का शिलालेख -
मंडोर की एक बावड़ी में शिला पर उत्कीर्ण इस लेख में 685 ई. के आसपास विष्णु एवं शिव की पूजा पर प्रकाश पड़ता है। मंडोर का दूसरा शिलालेख 837 ई. में बाउक ने खुदवाया (गुर्जर नरेश बाउक की प्रशस्ति) था। इसमें प्रतिहार शासकों के बारे में जानकारी, विष्णु एवं शिव पूजा का उल्लेख मिलती है।

मानमोरी का अभिलेख -
मानसरोवर झील (चित्तौड़) के तट पर एक स्तंभ पर उत्कीर्ण इस लेख में अमृत मंथन एवं उसके संबंध कर तथा चार राजाओं यथा- महेश्वर, भीम, भोज एवं मान का उल्लेख है। यह अभिलेख कर्नल जेम्स टॉड द्वारा असंतुलन के कारण इंग्लैंड ले जाते समय समुद्र में फेंक दिया गया था।

नांदसा यूप-स्तम्भ लेख - 
यह शिलालेख 225 ई. पूर्व का भीलवाड़ा के निकट नांदसा स्थान (भीलवाड़ा) पर एक सरोवर में प्राप्त गोल स्तंभ पर उत्कीर्ण है।

सांमोली शिलालेख - 
यह शिलालेख सांमोली (भोमट तहसील-उदयपुर) में प्राप्त हुआ, जो 646 ई. के गुहिल शासक शिलादित्य के समय का है। यह मेवाड़ के गुहिल वंश के समय को निश्चित करने व उस समय की आर्थिक व साहित्यिक स्थिती को जानने हेतु महत्त्वपूर्ण है।

घटियाला के शिलालेख, जोधपुर - 
861 ई. के ये लेख जोधपुर के पास घटियाला में एक स्तंभ पर उत्कीर्ण हैं। इनमें प्रतिहार नरेश कुक्कुक का वर्णन है । ये लेख संस्कृत में हैं। इनका लेखक मग एवं उत्कीर्णकर्ता कृष्णेश्वर था। इन लेखों में 'मग' जाति के ब्राह्मणों का उल्लेख मिलता है।

आदिवराह मंदिर का लेख - 
यह लेख आहड़ (उदयपुर) के आदिवराह मंदिर में प्राप्त हुआ, जो 944 ई. का है। इस लेख में संस्कृत में ब्राह्मी लिपि में उक्त मंदिर के निर्माण आदि का वर्णन है। यह लेख मेवाड़ शासक भर्तृहरि-द्वितीय के समय का है।

बरली का शिलालेख - 
यह शिलालेख अजमेर से 35 किमी. दूर बरली के पास भिलोत माता के मंदिर से प्राप्त हुआ। यह शिलालेख राजस्थान का प्राचीनतम शिलालेख कहलाता है। इसकी लिपि ब्राह्मी लिपि है। यह अजमेर संग्रहालय में है।

कणसवा का लेख - 
कोटा के निकट कणसवा गाँव के शिवालय में उत्कीर्ण यह लेख 738 ई. का हैं। इस अभिलेख में कोटा के शासक धवल मौर्यवंशी राजा का उल्लेख है। सम्भवत: धवल राजस्थान में अंतिम मौर्यवंशी राजा था।

चाटसू की प्रशस्ति, जयपुर - 
यह जयपुर के चाटसू में 813 ई. के इस लेख में वहाँ पर गुहिल वंशीय राजाओं की वंशावली व उनकी विजयों उल्लेख किया गया है।

प्रतापगढ़ अभिलेख - 
प्रतापगढ़ से प्राप्त इस अभिलेख मे संस्कृत भाषा में एवं नागरी लिपि में 946 ई. के आसपास के गुर्जर-प्रतिहार शासक महेन्द्रपाल तथा अन्य शासकों की नामावली एवं उपलब्धियों का वर्णन किया हुआ है।

नाथ प्रशस्ति - 
971 ई. की यह प्रशस्ति एकलिंगजी के मंदिर के पास लकुलीश मंदिर से प्राप्त हुई है। इसमें नागदा नगर, बापा रावल, गुहिल वंश के राजाओं का वर्णन है। इसके रचयिता आम्र कवि थे।

हर्षनाथ की प्रशस्ति - 
यह प्रशस्ति 973 ई. की हर्षनाथ (सीकर) के मंदिर से प्राप्त हुई है। इसमें मंदिर का निर्माण अल्लट द्वारा किये जाने का उल्लेख है। इसमें चौहानों के वंशक्रम एवं उनकी उपलब्धियों का उल्लेख है।

आर्थूणा के शिव मंदिर की प्रशस्ति - 
इस प्रशस्ति का रचनाकार विजय था। आथूणा (बाँसवाड़ा) के शिवालय में उत्कीर्ण 1079 ई. के इस अभिलेख में वागड़ के परमार नरेशों का अच्छा वर्णन है।

सादड़ी एवं नाडोल का लेख -
1090 ईस्वी के इस लेख में जोजलदेव के समय का वर्णन मिलता है।

किराडू का लेख - 
किराडू (बाड़मेर) के शिवमंदिर में 1161 ई. का उत्कीर्ण लेख जिसमें वहाँ की परमार शाखा का वंशक्रम दिया है। यह संस्कृत भाषा में उत्कीर्णित है। इसमें परमारों की उत्पत्ति ऋषि वशिष्ठ के आबू यज्ञ से बताई गई है।

सांडेराव का लेख - 
यह देसूरी (पाली) के निकट स्थित सांडेराव के महावीर जैन मंदिर का अभिलेख है। यह अभिलेख 1164 ई. में कल्हणदेव के काल का है, इसमें उसके परिवार द्वारा मंदिर को दिये गए दान का उल्लेख है।

चीरवा का शिलालेख, उदयपुर - 
यह शिलालेख 1273 ईस्वी में उत्कीर्णित है। इस शिलालेख पर बापा रावल के वंशजों- पदमसिंह, जैत्रसिंह, तेजसिंह एवं समरसिंह की उपलब्धियों का वर्णन है। 

चित्तौड़ का शिलालेख - 
1278 ई. का यह लेख उस समय के गुहिल शासकों की धार्मिक सहिष्णुतापूर्ण नीति को बताता है। इसमें शैव मतावलम्बी होते हुए भी राज परिवार द्वारा जैन मंदिर के निर्माण हेतु अनुदान देने का वर्णन है।

जैन कीर्ति स्तम्भ लेख - 
चित्तौड़ के जैन कीर्ति स्तंभ में उत्कीर्ण 13 वीं सदी के तीन अभिलेखों का प्रशस्तिकार जीजा था। इसमें जीजा के वंश तथा मंदिर निर्माण एवं दानों का वर्णन मिलता है। 

बिजौलिया शिलालेख - 
5 फरवरी, 1170 ई. का यह शिलालेख बिजौलिया के पार्श्वनाथ मंदिर के पास एक चट्टान पर उत्कीर्ण है। इसका रचयिता गुणभद्र था। जैन श्रावक लोलाक द्वारा पार्श्वनाथ मंदिर के निर्माण की स्मृति में उत्कीर्ण करवाया गया था। इस शिलालेख में सांभर व अजमेर के चौहानों को वत्सगौत्रीय ब्राह्मण बताया गया है तथा उनकी वंशावली दी गई है। इस लेख में उस समय के क्षेत्रों के प्राचीन नाम भी दिये गये हैं : जैसे - जाबालीपुर (जालौर), शाकम्भरी (सांभर), श्रीमाल (भीनमाल) आदि।

सच्चिया माता की प्रशस्ति - 
यह प्रशस्ति ओसिया (जोधपुर) में सच्चिया माता के मंदिर में उत्कीर्ण है। इस प्रशस्ति में कल्हण एवं कीर्तिपाल का
वर्णन है। इससे मारवाड़ की राजनीतिक स्थिति व शासन व्यवस्था पर प्रकाश पड़ता है।

डूंगरपुर की प्रशस्ति - 
1404 ई. की यह प्रशस्ति डूंगरपुर के उपरगाँव नामक ग्राम में जैन मंदिर में संस्कृत में उत्कीर्ण है।

रणकपुर प्रशस्ति, पाली  -
यह प्रशस्ति 1439 ई. में रणकपुर के चौमुखा मंदिर के स्तंभ पर उत्कीर्ण है। इसका प्रशस्तिकार देपाक (दीपा) था। इस प्रशस्ति पर मेवाड़ के राजवंश धरणक सेठ वंश का वर्णन मिलता है। इसमें बापा रावल एवं कालभोज को अलग-अलग व्यक्ति बताया गया है। इसमें महाराणा कुंभा की विजयों एवं विरुदों का पूरा वर्णन है। इस प्रशस्ति में महाराणा कुम्भा को विजेता के साथ-साथ एक सफल प्रशासक, धर्मपरायण, न्यायप्रिय एवं प्रजापालक बताया गया है। प्रशस्ति में गुहिल को बापा रावल का पुत्र लिखा गया है।

राज प्रशस्ति, राजसमंद - 
यह विश्व की सबसे बड़ी प्रशस्ति है, जो कि राजसमंद झील की नौ चौकी पाल की ताकों में लगी 25 काले शिलालेखों पर संस्कृत भाषा में उत्कीर्ण है। इसके रचयिता रणछोड़ भट्ट तैलंग थे। इस प्रशस्ति पर मेवाड़ के बापा रावल से लेकर जगतसिंह-राजसिंह तक के शासकों की वंशावली एवं उपलब्धियों का वर्णन है।

कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति - 
इसके प्रशस्तिकार महेश भट्ट थे। यह राणा कुम्भा की प्रशस्ति है। यह प्रशस्ति चित्तौड़गढ़ किले के कीर्ति स्तंभ में कई शिलाओं पर संस्कृत भाषा में उत्कीर्ण है। अब केवल दो ही शिलाएँ उपलब्ध हैं। इस प्रशस्ति में गुहिल वंश के बापा से लेकर कुंभा तक की विस्तृत वंशावली एवं उनकी उपलब्धियों का वर्णन है। कुंभा की विजयों का विस्तृत विवरण एवं उसके द्वारा रचित ग्रंथों का वर्णन किया है। इस प्रशस्ति में कुम्भा को महाराजाधिराज, हिन्दू सुरताण, अभिनव भरताचार्य, छापगुरु, दानगुरु, राणो रासो, शैलगुरु जैसी उपलब्धियों से पुकारा गया है। इसमें कुंभा द्वारा मालवा व गुजरात सेनाओं को हराने का वर्णन तथा विभिन्न मंदिरों एवं निर्माणों की तिथियाँ दी गई हैं।

कुम्भलगढ़ प्रशस्ति, राजसमंद -
इस प्रशस्ति के रचयिता महेश थे। यह प्रशस्ति पांच शिलाओं पर उत्कीर्ण थी, जो कुंभश्याम मंदिर (कुंभलगढ़) में लगाई हुई थीं। इसमें संस्कृत में तथा नागरी लिपि में तत्समय के जन-जीवन, तीर्थ स्थान, भौगोलिक वर्णन, चित्तौड़ का वर्णन मिलता है। इसके राज वर्णन में गुहिल वंश का विवरण एवं शासकों उपलब्धियों का वर्णन मिलता है। इसमें बापा रावल को विप्रवंशीय बताया गया है। इस प्रशस्ति में हम्मीरदेव चौहान को 'विषम घाटी पंचानन' कहा है।

वैद्यनाथ प्रशस्ति - 
यह पिछोला झील के निकट सीसारमा गांव के वैद्यनाथ मंदिर में स्थित है। इसके रचयिता रुपभट्ट थे।

सिवाना का लेख -
1537 ई. का यह लेख राव मालदेव (जोधपुर) की सिवाना विजय का सूचक है।

बीकानेर दुर्ग की प्रशस्ति/जूनागढ़ प्रशस्ति - 
इस प्रशस्ति के रचयिता जइता नामक जैन मुनि थे। यह संस्कृत भाषा में उत्कीर्ण है। बीकानेर नरेश रायसिंह द्वारा जूनागढ़ किले में इस प्रशस्ति को स्थापित किया गया। इस प्रशस्ति पर जूनागढ़ दुर्ग के निर्माण की तिथि, राव बीका से लेकर राव रायसिंह तक के शासकों की उपलब्धियों, रायसिंह की विजयों एवं साहित्य प्रेम आदि का वर्णन है।

आमेर का लेख -
यह अभिलेख 1612 ई. का है। इस अभिलेख में कछवाहा शासकों में पृथ्वीराज से मानसिंह तक की वंशावली व उपलब्धियों, जमवारामगढ़ में निर्माणों का उल्लेख है। इसमें कछवाहा वंश को रघुवंश तिलक कहा गया है।

जगन्नाथ राय प्रशस्ति -
इस प्रशस्ति के रचयिता कृष्णभट्ट थे। यह उदयपुर के जगन्नाथराय मंदिर में काले पत्थर पर मई, 1652 में उत्कीर्ण की गई थी। इसमें हल्दीघाटी युद्ध, कर्ण के समय विनाश के वर्णन के अलावा महाराणा जगतसिंह के युद्धों एवं पुण्य कार्यों का विस्तृत विवेचन है।

ताम्र पत्र (Copper Plates) -

  • धुलेव का दान-पत्र
  • मथनदेव का ताम्र-पत्र
  • ब्रोच गुर्जर ताम्र-पत्र
  • वीरपुर का दान-पत्र
  • आहड़ का ताम्र-पत्र
  • चीकली का ताम्र-पत्र
  • पारसोली का ताम्र-पत्र
  • ढोल का ताम्र-पत्र
  • बेड़वास गांव का दानपत्र
  • कीटखेड़ी का ताम्रपत्र
  • ठीकरा गांव का ताम्रपत्र
  • डीगरोल गांव का ताम्रपत्र
  • पीपली गांव का ताम्रपत्र
  • रंगीली गांव का ताम्रपत्र
  • पारणपुर दानपत्र
  • राजसिंह का ताम्रपत्र
  • बेगूं का ताम्रपत्र
  • प्रतापगढ़ का ताम्रपत्र
  • वरखेड़ी का ताम्रपत्र
  • कोडमदेसर का कीर्तिस्तम्भ
  • लावा गांव का ताम्रपत्र

विभिन्न रियासतों में प्रचलित सिक्के (मुद्राशास्त्र) -

  • मेवाड़ रियासत के सिक्के - भीलड़ी, मुगली सिक्का एलची, चित्तोडी, उदयपुरी, चांदौड़ी, स्वरूपशाही, ढींगाल, शाहआलमी आदि।
  • जयपुर रियासत के सिक्के - मुहम्मदशाही सिक्के, झाड़शाही, हाली आदि।
  • जैसलमेर रियासत के सिक्के - मुहम्मदशाही, डोडिया, अखेशाही आदि।
  • जोधपुर रियासत के सिक्के - भीमशाही, लल्लूलिया, विजयशाही, गजशाही आदि।
  • बीकानेर रियासत के सिक्के - गजशाही सिक्के।
  • बूंदी रियासत के सिक्के - रामशाही, चेहरेशाही, पुराना रुपया, कटारशाही, ग्यारह-सना आदि।
  • अलवर रियासत के सिक्के - अखेशाही, ताँबे के रावशाही टक्का, अंग्रेजी पाव आना सिक्का, रावशाही आदि।
  • डूंगरपुर रियासत के सिक्के - उदयशाही, चित्तौड़ी, सलीमशाही, त्रिशूलिया, पत्रीसीरिया आदि।
  • धौलपुर  रियासत के सीके - तमंचाशाही।
  • सलूम्बर के सिक्के - पद्मशाही।
  • झालावाड़ रियासत के सिक्के - नये मदनशाही, पुराने मदनशाही आदि।
  • बांसवाड़ा रियासत के सिक्के - लक्ष्मणशाही, सलीमशाही आदि।
  • प्रतापगढ़ रियासत के सिक्के - सलीमशाही, मुबारक़शाही, सिक्का मुबारक लन्दन आदि।
  • किशनगढ़ रियासत के सिक्के - शाहआलमी सिक्के।
  • शाहपुरा रियासत के सिक्के - संदिया, चित्तौड़ी, भीलाड़ी, माधेशाही आदि।
  • करौली रियासत के सिक्के - माणकशाही सिक्के।
  • सिरोही रियासत के सिक्के - चांदी का भीलाड़ी, ताँबे का ढब्बुशाही।
  • नागौर की टकसाल - अमरशाही सिक्के।
  • कोटा रियासत के सिक्के - मदनशाही, हाली, गुमानशाही आदि।
  • पाली रियासत के सिक्के - बिजेशाही।

राजस्थान के इतिहास के साहित्यिक स्रोत

राजस्थानी साहित्य से राजस्थान के इतिहास से सम्बंधित काफी सूचनाएं मिलती है। राजस्थान के इतिहास से सम्बंधित विभिन्न साहित्यिक स्रोतों (महत्वपूर्ण पुस्तकों) से सम्बंधित महत्वपूर्ण लेख हमने पहले से ही प्रकाशित कर दिया है। जिसे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें - Click Here

राजस्थान के शोध संस्थान एवं संग्रहालय

राजस्थान में राजस्थान के इतिहास के साक्षी संग्रहालय एवं महत्वपूर्ण शोध संस्थान से सम्बंधित महत्वपूर्ण जानकारी यहां से पढ़ें - Click Here

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