अजमेर के चौहान वंश का इतिहास : आज की इस पोस्ट में अजमेर के चौहान/सांभर के चौहान/शाकम्भरी के चौहान के इतिहास से सम्बंधित महत्वपूर्ण लेख लिखा गया है। इसमें आप सभी द्वारा अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न शाकम्भरी के चौहान वंशज Trick PDF Download, चौहान वंश के प्रमुख शासकों के नाम, चौहान वंश गौत्र, चौहान वंश की कुलदेवी, संस्थापक, वंशावली आदि से सम्बंधित महत्वपूर्ण जानकारी दी गयी है। 
अजमेर के चौहान/सांभर के चौहान/शाकम्भरी के चौहान
अजमेर/सांभर/शाकम्भरी के चौहान

सांभर के चौहान/शाकम्भरी के चौहान

शाकम्भरी के चौहान - चौहान काल की जानकारी बिजौलिया शिलालेख देता है, जिसके अनुसार चौहान वत्स ऋषि वंशज है। चंदरबरदाई, मुहणौत नैणसी एवं सूर्यमल्ल मिश्रण के अनुसार चौहान की उत्पति आबू पर्वत पर गुरु वशिष्ठ के अग्निकुंड से हुई है, जिससे चार राजपूत योद्धाओं - प्रतिहार, परमार, चालुक्य तथा चौहान अग्निकुंड से पैदा हुए थे। कर्नल जेम्स टॉड, स्मिथ तथा कुक चौहानों को विदेशी बताते है। हम्मीर महाकाव्य, ओझा, हम्मीर रासौ के अनुसार चौहान सूर्यवंशी है। चौहानों का मूल स्थान सपादलक्ष माना जाता है, तो चौहानों की प्रथम राजधानी 'अहिछत्रपुर' (नागौर) थी। सबसे पहले चौहानों का हंसोट शिलालेख पाया गया।

वासुदेव चौहान - 

  • वासुदेव चौहान ने 551 ई० में साँभर (सपादलक्ष) में चौहान वंश की स्थापना की। इसलिए इन्हें 'चौहानों का आदि पुरुष' कहते हैं।
  • सांभर झील के आस-पास के क्षेत्र को सपादलक्ष क्षेत्र कहा जाता है, इसकी राजधानी अहिच्छत्रपुर(नागौर) थी।
  • सोमेश्वर द्वारा निर्मित बिजौलिया शिलालेखानुसार साँभर झील का निर्माण वासुदेव ने करवाया, वास्तविकता में यह झील प्राकृतिक है।

अजयराज चौहान - 

  • अजयराज चौहान ने 1113 में अजयमेरू नगर (वर्तमान अजमेर) बसाकर साँभर से अजमेर को सबसे पहले चौहानों की राजधानी बनाई।

अर्णोराज/आनाजी -

  • अर्णोराज ने तुर्कों को पराजित करके 1137 ई० में आनासागर झील का निर्माण किया था।
  • अर्णोराज ने पुष्कर में वराह मन्दिर का निर्माण करवाया था।
  • अर्णोराज को गुजरात के चालुक्य शासक कुमारपाल ने आबू के निकट युद्ध में पराजित किया था।
  • अर्णोराज के पुत्र जगदेव ने इनकी हत्या कर दी इसलिए जगदेव 'चौहानों में पितृहन्ता' कहलाता है।

विग्रहराज चतुर्थ (बीसलदेव) - 

  • विग्रहराज चतुर्थ को बीसलदेव, कवि बांधव/कटिबांधव आदि नामो से भी पुकारा जाता है।
  • विग्रहराज चतुर्थ विद्वानों का आश्रय दाता था, इसलिए इसे 'कवि बान्धव' के नाम से जाना जाता है। 
  • विग्रहराज चतुर्थ ने हरिकेली नाटक की रचना की।
  • विग्रहराज चतुर्थ ने बीसलसागर तालाब (वर्तमान बीसलपुर बाँध के स्थान पर) का निर्माण करवाया था।
  • विग्रहराज चतुर्थ ने संस्कृत पाठशाला (सरस्वती कण्ठ भरण) अजमेर में बनवाई, जिसे कुतुबुद्दीन ऐबक ने तुड़वाकर अढ़ाई दिन का झोपड़ा बनवा दिया, जहां पर पंजाब शाहसंत का ढाई दिन का उर्स/मेला लगता है।
  • विग्रहराज चतुर्थ ने चौहान साम्राज्य का सर्वाधिक विस्तार दिल्ली तक कर पहली बार 'दिल्ली को चौहानों की राजधानी' बनाई, इसलिए इनके काल को 'चौहानों का स्वर्णकाल' कहलाता है।
  • विग्रहराज के बारे में किल होर्न ने लिखा है कि "वह उन हिन्दू शासको में से एक था जो कालीदास व भवभूति से होड़ कर सकता था"।
  • विग्रहराज चतुर्थ के दरबारी कवि - नरपति नाल्ह (बीसलदेव रासौ की रचना की) तथा सोमदेव ( ललित विग्रहराज की रचना की) थे।

पृथ्वीराज चौहान तृतीय (1177-1192) - 

  • पृथ्वीराज चौहान तृतीय का जन्म 1166 ईस्वी में हुआ था।
  • पृथ्वीराज चौहान तृतीय के पिता सोमेश्वर व माता कर्पुरी देवी (संरक्षिका) थी।
  • पृथ्वीराज चौहान तृतीय की पत्नि/प्रेमिका - संयोगिता (कन्नौज के राजा जयचंद गहड़वाल की पुत्री)
  • पृथ्वीराज चौहान तृतीय का पुत्र गोविंदराज चौहान था।
  • पृथ्वीराज चौहान तृतीय का प्रधानमंत्री - कैमास (कदंबदास)
  • पृथ्वीराज चौहान तृतीय की उपाधियाँ - राय पिथौरा, दल पंगुल (विश्व विजेता) आदि।
  • पृथ्वीराज चौहान तृतीय के दरबारी कवि - चंदरबरदाई, वागीश्वर, विद्यापति गौड़, जयानक, जनार्दन, आशाधर आदि।
  • पृथ्वीराज चौहान तृतीय अजमेर के चौहान वंश का अंतिम प्रतापी शासक था, जिसने दिल्ली और अजमेर राजधानीयों से शासन किया।
  • पृथ्वीराज चौहान तृतीय मात्र 11 वर्ष की अल्पायु में शासक बने थे, इसलिए शासन की बागडोर इसकी माँ कर्पूरी देवी ने संभाली।
  • पृथ्वीराज चौहान तृतीय ने भंडानक जाति एवं नागार्जुन के विद्रोह का दमन किया था।
  • महोबा/तुमुल का युद्ध - पृथ्वीराज चौहान तृतीय ने अपनी दिग्विजय की नीति के तहत 1182 ई० में 'महोबा के युद्ध/तुमुल का युद्ध' (उत्तर प्रदेश) में परमर्दी देव चन्देल (परमर्दी देव के सेनापति आल्हा व उदल) को पराजित किया।
  • पृथ्वीराज चौहान तृतीय कन्नौज के राजा जयचंद गहड़वाल को हराकर उसकी पुत्री संयोगिता को स्वयंवर से उठाकर ले गया, जिससे पृथ्वीराज चौहान तृतीय एवं जयचंद गहड़वाल के बीच दुश्मनी बढ़ गयी। इसी वजह से तराइन के युद्ध में जयचंद गहड़वाल ने पृथ्वीराज चौहान तृतीय की बजाय मोहम्मद गौरी की सहायता की थी।
  • तराइन का प्रथम युद्ध - तराइन का प्रथम युद्ध 1191 ई० में पृथ्वीराज चौहान तृतीय व मोहम्मद गौरी के मध्य तराइन के मैदान करनाल (हरियाणा) में हुआ। इस युद्ध में पृथ्वीराज चौहान तृतीय की सेना की ओर से गोविंदराज तोमर ने तीर चलाया जिससे मोहम्मद गौरी घायल होकर वापस गजनी चला गया। इस प्रकार पृथ्वीराज चौहान तृतीय विजय हुई।
  • तराइन का द्वितीय युद्ध - तराइन का द्वितीय युद्ध 1192 ई० में पृथ्वीराज चौहान तृतीय व मोहम्मद गौरी के मध्य तराइन के मैदान करनाल (हरियाणा) में हुआ, जिसमें मोहम्मद गौरी जीता। युद्ध से पहले मोहम्मद गौरी ने किवाम-उल-मुल्क को संधि वार्ता हेतु पृथ्वीराज चौहान तृतीय के दरबार में भेजा था। ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती मोहम्मद पृथ्वीराज चौहान तृतीय के समय मोहम्मद गौरी के साथ राजस्थान आये। 
  • पृथ्वीराज चौहान तृतीय के घोड़े का नाम नाट्यरंभा था।
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