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राजस्थान के प्रमुख दुर्ग/किले - Rajasthan Forts List in Hindi | Rajasthan Ke Durg Rajasthan GK in Hindi
राजस्थान के प्रमुख दुर्ग





    राजस्थान के दुर्गों के प्रकार

    राजस्थान के दुर्गों को मुख्यत: निम्न प्रकार से वर्गीकृत किया जा सकता है :-
    • गिरी दुर्ग - ऐसे दुर्ग जो ऊँचे पर्वत/गिरी पर स्थित होते है और जिनके चारों ओर पर्वत श्रेणियां होती है। जैसे - चित्तौड़गढ़ दुर्ग, कुम्भलगढ़ दुर्ग, रणथम्भौर दुर्ग (यह वन दुर्ग की श्रेणी में भी आता है), जालौर दुर्ग, सोजत दुर्ग, मेहरानगढ़ दुर्ग, सिवाना का किला, किलोनगढ दुर्ग, अचलगढ़ दुर्ग, तारागढ़ दुर्ग(बूंदी), गढ़बीठली  दुर्ग, टॉडगढ़, आमेर दुर्ग, जयगढ़ दुर्ग, नाहरगढ़ दुर्ग, मांडलगढ़ दुर्ग, दौसा का किला, बाला किला, काकनवाडी का किला,  राजोरगढ़  दुर्ग, नीमराना का किला, भानगढ़ दुर्ग, बयाना दुर्ग, त्रिभुवनगढ़ दुर्ग, वसंतगढ़ दुर्ग आदि।
    • जल दुर्ग - ऐसे दुर्ग जिनके चारों ओर दूर-दूर तक फैला हुआ जल हो, जलदुर्ग कहलाते है। जैसे - गागरोन का किला, भैंसरोड़गढ दुर्ग, शेरगढ़ (कोषवर्द्धन) दुर्ग आदि।
    • धान्वन दुर्ग - ऐसे दुर्ग जो मरुस्थल में बने हुए हो तथा उनके आस-पास उबड़-खाबड़ भूमि एवं झाड़-झंखाड़ हो, धान्वन दुर्ग कहलाते है। जैसे - जैसलमेर दुर्ग, भटनेर का किला, नागौर का किला, बीकानेर का जूनागढ़ किला, चूरू का किला आदि।
    • स्थल दुर्ग या मही दुर्ग - ऐसे दुर्ग जिनका प्रस्तर खण्डों या ईंटों से समतल भूमि पर निर्मित दुर्ग स्थल दुर्ग कहलाते है।  जैसे - चौमू का किला, माधोराजपुरा का किला आदि।
    • पारिख दुर्ग - ऐसे दुर्ग जिनके चारों ओर गहरी खाई बनी हुई हो, पारिख दुर्ग कहलाते है। जैसे - लोहागढ़  दुर्ग आदि।

    यहां पर राजस्थान के विभिन्न दुर्ग का विस्तार से वर्णन निम्न प्रकार है:-

    अलवर का किला ( बाला किला )

    • बाला किले के उपनाम - बड़ा किला, बावनगढ़ का लाडला, अलवर का किला आदि।
    • अलवर के किले का निर्माण - अलवर के किले का निर्माण कोकिल देव के पुत्र अलघुराय ने करवाया था तथा इस दुर्ग का पुन:निर्माण हसन खान मेवाती ने करवाया था।
    • अलवर दुर्ग 'गिरी दुर्ग' की श्रेणी में आता है।
    • बाबर एक रात इस दुर्ग में रुका था।
    • अकबर ने अपने पुत्र जहांगीर को इस बाला किला में नजरबंद करवाया था।
    • अलवर किले के किनारे जहांगीर (सलीम) ने सलीम महल तथा सलीम सागर का निर्माण करवाया।
    • बाला किले में प्रवेश के लिए 6 प्रवेश द्वार हैं - चांदपोल, सूरजपोल ,जयपोल, किशनपोल, अंधेरी गेट एवं लक्ष्मणपुर। इस किले में 3359 कंगूरे, 15 बड़ी और 51 छोटी बुर्जें है। इस किले पर कभी युद्ध नहीं हुआ, इसलिए इस किले को बाला किला अथवा कुंवारा किला के नाम से भी जाना जाता है।

    नागौर का किला (Nagaur Fort)

    • नागौर दुर्ग के उपनाम -  नागाणा दुर्ग/अहिछत्रपुर दुर्ग/नाग दुर्ग आदि।
    • नागौर दुर्ग का निर्माण - नागौर दुर्ग का निर्माण सोमेश्वर के सामंत केमास ने विक्रम संवत 1211 में करवाया था।
    • नागौर दुर्ग एक ऐसा दुर्ग है, जिस पर दागे गए तोप के गोले महलों को क्षति पहुंचाए बिना ऊपर से निकल जाते है।
    • नागौर का किला "धान्व दुर्ग" की श्रेणी में आता है।
    • 1570 ईस्वी में अकबर ने नागौर दुर्ग में आमेर के शासक भारमल की सहायता से नागौर दरबार लगाया था। उसकी याद के लिए शुक्र तालाब का निर्माण करवाया गया। यहां पर अमरसिंह राठौड़ की छतरी भी बनी हुई है।
    • यूनेस्को द्वारा वर्ष 2007 में नागौर दुर्ग को "अवार्ड ऑफ़ एक्सीलेंस" से सम्मानित किया गया था।
    • इस दुर्ग में सुन्दर कलात्मक बादल महल भी स्थित है।

    खींवसर किला (Khinvsar Fort)

    • खींवसर किले में मुगल सम्राट औरंगजेब रुके थे।
    • खींवसर किला अब एक हेरीटेज होटल के रूप है।
    • खींवसर किले को जागीरदारों के किलों का सिरमौर भी कहा जाता है।
    • खींवसर किले का निर्माण - खींवसर किले का निर्माण मेड़तिया शासक जालिम सिंह ने करवाया था। 

    मेड़ता का किला (Medta Fort)

    • मेड़ता के किले के उपनाम - मालकोट, मेड़तकपुर दुर्ग आदि।
    • मेड़ता में राव मालदेव द्वारा निर्मित मालकोट का किला (मेड़तकपुर दुर्ग) स्थित है। जहां पर मीराबाई ने अपना जीवन व्यतीत किया था। यहां पर मीराबाई का महल एवं मीराबाई का मंदिर भी स्थित है।
    • मेड़ता का प्राचीन नाम - मेदिनीपुर था।
    • मेड़ता में डागोलाई तालाब पर कप्तान डी. बौरबोन की कब्र भी स्थित है। 

    कुचामन दुर्ग (Kuchaman Fort)

    • कुचामन दुर्ग को जागीरी किलो का सिरमौर माना जाता है।
    • कुचामन दुर्ग नागौर जिले का गिरी दुर्ग है।
    • ऐसा माना जाता है कि कुचामन के पराक्रमी मेड़तिया शासक जालिमसिंह ने पनखण्डी नामक महात्मा के आशीर्वाद से कुचामन दुर्ग की नींव रखी थी जिसका कालांतर में उनके यशस्वी वंशजों द्वारा विस्तार एवं परिवर्द्धन किया गया।

    कोटा दुर्ग (Kota Fort)

    • कोटा दुर्ग की नींव जैतसिंह ने चम्बल नदी के किनारे रखी थी।
    • कोटा दुर्ग के बारे में कर्नल जेम्स टॉड ने कहा है कि "आगरा के किले को छोड़कर किसी भी किले का परकोटा इतना बड़ा नहीं जितना कि कोटा गढ़ का है" |
    • कोटा दुर्ग में स्थित झाला हवेली के बारे में खंडेलवाला ने कहा है कि 'यहां के भित्ति चित्र एशिया में अपने सानी नहीं रखते ' |

    सज्जनगढ़ दुर्ग (Sajjangarh Fort)

    • सज्जनगढ़ दुर्ग उदयपुर जिले में स्थित है।
    • सज्जनगढ़ दुर्ग को "उदयपुर का मुकुटमणि" कहते है।
    • सज्जनगढ़ दुर्ग का निर्माण - सज्जनगढ़ दुर्ग का निर्माण सज्जनसिंह ने बांसदरा नामक पहाड़ी पर करवाया गया था।

    चूरू का किला (Churu Fort)

    • चूरू किले का निर्माण :चूरू के किले का निर्माण 1739 ईस्वी में ठाकुर कुशाल सिंह द्वारा करवाया गया था।
    • चूरू के किले के ठाकुरों ने अपनी रक्षा हेतु शत्रुओं पर गोला और बारूद खत्म हो जाने पर चांदी के गोले बनाकर दुश्मनों पर दागे थे। इसलिए चांदी के गोले दागने वाला किला - चूरू का किला है। 

    भानगढ़ का दुर्ग (Bhangarh Fort)

    • भानगढ़ दुर्ग के उपनाम - खंडहरों का नगर, भूतहा किला आदि।
    • भानगढ़ दुर्ग अलवर जिले की राजगढ़ तहसील में सांवण नदी के तट पर सरिस्का अभ्यारण्य में स्थित है।
    • भानगढ़ दुर्ग का निर्माण - भानगढ़ दुर्ग का निर्माण 1573 ईस्वी में आमेर के राजा भगवंतदास ने करवाया था।
    • भानगढ़ दुर्ग वर्तमान में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया) द्वारा सरंक्षित है।
    • भानगढ़ एवं अजबगढ़ को इतिहास और पुरातत्व का खजाना कहते है।

    जैसलमेर दुर्ग/सोनार किला

    • जैसलमेर दुर्ग का निर्माण - जैसलमेर दुर्ग की नीव महारावल जैसल देव ने 12 जुलाई 1155 में रखी थी तथा इनकी मृत्यु हो जाने पर इसका अधिकतर निर्माण कार्य उसके पुत्र एवं उत्तराधिकारी शालिवाहन द्वितीय ने करवाया था।
    • जैसलमेर दुर्ग मेरू पहाड़ी पर स्थित है।
    • जैसलमेर दुर्ग राजस्थान का दूसरा सबसे पुराना किला है।
    • जैसलमेर दुर्ग को बनाने में चूने का प्रयोग नहीं किया गया है।
    • यह दुर्ग पीले पत्थरों से बना होने से स्वर्णिम आभा लिए हुए प्रतीत होता है, इसलिए इसे सोनार किला कहा जाने लगा।
    • जैसलमेर दुर्ग के उपनाम - सोनार का किला, त्रिकूटगढ़, रेगिस्तान का गुलाब, गलियों का दुर्ग, जैसाणगढ़, स्वर्ण गिरी, पश्चिमी सीमा का प्रहरी, त्रिकुटांचल,  गोडहरा, गोरहरागढ़, सोनगिरी, द गोल्डन फोर्ट, राजस्थान का अंडमान, भाटी भड़-किवाड़, रेत का समुद्र में लंगर लिए हुए जहाज के समान आदि।
    • जैसलमेर दुर्ग एकमात्र ऐसा दुर्ग है जिसकी छत लकड़ी की बनी हुई है। इस दुर्ग के निर्माण में चूने का प्रयोग नहीं किया गया है।
    • वर्ष 2009 में आये भूकंप से इस दुर्ग में दरारें पड़ गयी थी।
    • यह विशाल दुर्ग अंगड़ाई लेते हुए शेर के समान प्रतीत होता है। इस दुर्ग में 99 बुर्जे हैं।
    • जैसलमेर दुर्ग के लिए एक कहावत प्रचलित है कि "यहां पत्थर के पैर, लोहे का शरीर और काठ के घोड़े पर सवार होकर ही पहुंचा जा सकता है" (घोडा कीजे काठ का पग कीजे पाषाण, अख्तर कीजे लोहे का तब पहुंचे जैसाण) |
    • एक अन्य कहावत भी प्रचलित है "गढ़ दिल्ली गढ़ आगरो, अधगढ बीकानेर, भलो चुणायो भाटियों सिरे तो जैसलमेर"
    • अबुल फजल ने जैसलमेर दुर्ग के बारे में कहा है कि "ऐसा दुर्ग जहां पहुँचने के लिए पत्थर की टाँगे चाहिए"
    • जैसलमेर दुर्ग के प्रवेश द्वार - अक्षय पोल, सूरजपोल, गणेश पोल, हवापोल आदि।
    • जैसलमेर दुर्ग में जैसलू का कुआं भी बना हुआ है।
    • जैसलमेर दुर्ग पर सत्यजीत रे ने सोनार किला नामक फिल्म बनाई थी। इस दुर्ग को उत्तरी सीमा का प्रहरी भी माना जाता है।
    • जैसलमेर दुर्ग पर वर्ष 2009 में पांच रूपये का डाक टिकट जारी किया गया था।
    • जैसलमेर दुर्ग राजस्थान में चित्तौड़गढ़ दुर्ग के बाद दूसरा सबसे बड़ा लिविंग फोर्ट है।
    • जैसलमेर दुर्ग को यूनेस्को द्वारा वर्ष 2013 में विश्व धरोहर की सूची में शामिल किया था।

     जैसलमेर दुर्ग के ढाई साके :-

    • जैसलमेर का प्रथम शाखा - जैसलमेर के भाटी शासक मूलराज एवं दिल्ली सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के मध्य 1313 के लगभग युद्ध हुआ। जिसमें मूलराज ने केसरिया एवं रानियों ने जोहर किया था।
    • जैसलमेर का दूसरा साका - रावल दूदा (महारावल दुर्जनसाल) तथा दिल्ली के सुल्तान फिरोज़ शाह तुगलक के मध्य 1357 में युद्ध लड़ा गया था। इसमें केसरिया एवं जोहर हुआ था। यह जैसलमेर का द्वितीय साका था।
    • जैसलमेर का तीसरा अर्द्ध साका - जैसलमेर के राव लूणकरण एवं कंधार के राज्यच्युत शासक अमीर अली के मध्य 1550 ईस्वी में युद्ध हुआ था। जिसमें वीरों ने केसरिया तो किया था लेकिन जोहर नहीं हुआ था। इसलिए इसे अर्द्ध साका कहा जाता है। 

    अचलगढ़ दुर्ग (Achalgarh Fort)

    • अचलगढ़ दुर्ग को आर्बुद दुर्ग भी कहा जाता है।
    • अचलगढ़ दुर्ग आबू पर्वत पर मंदाकिनी झील के किनारे स्थित है।
    • अचलगढ़ दुर्ग का निर्माण - अचलगढ़ दुर्ग का निर्माण परमार शासकों ने करवाया था तथा इस दुर्ग का पुनर्निर्माण 1452 ईस्वी में महाराणा कुंभा के द्वारा करवाया गया।
    • अचलगढ़ दुर्ग में अंकलेश्वर महादेव का मंदिर, कपूर सागर तालाब, सावन भादो झील, ओखा रानी का महल आदि दर्शनीय स्थल स्थित है। 

    चित्तौड़गढ़ दुर्ग/चित्तोड़ का किला

    • चित्तौड़गढ़ दुर्ग के लिए एक कथन बहुत प्रचलित है - "गढ़ तो चित्तौड़गढ़ बाकि सब गढ़ैया"|
    • चित्तौड़गढ़ दुर्ग/किले के उपनाम - राजस्थान का गौरव, गढ़ों का सिरमौर, मालवा का प्रवेश द्वार, चित्रकूट दुर्ग, खिज्राबाद, वॉटर फोर्ट, राजस्थान का गौरव, राजस्थान का दक्षिणी प्रवेश द्वार।
    • चित्तौड़गढ़ दुर्ग का निर्माण - इस अभेद्य चित्तौड़गढ़ दुर्ग का निर्माण मौर्य शासक चित्रांगद (चित्रांग) मौर्य ने गम्भीरी और बेड़च नदियों के संगम स्थल के निकट आरावली पर्वतमाला के एक विशाल पर्वत शिखर मेसा के पठार पर करवाया था।
    • चित्तौड़गढ़ दुर्ग का अधिकांश निर्माण महाराणा कुम्भा ने करवाया। इसलिए कुम्भा को "चित्तौड़गढ़ दुर्ग का आधुनिक निर्माता" कहते है।
    • गुहिलवंशीय शासक बप्पा रावल ने हरित ऋषि के आशीर्वाद से मौर्य शासक मान मौर्य से 734 ईस्वी में चित्तौड़गढ़ दुर्ग को जीता था और मेवाड़ में गुहिल  साम्राज्य की नीव रखी थी। इसलिए बप्पा रावल को 'गुहिल साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक" कहा जाता है।
    • चित्तौड़गढ़ दुर्ग राजस्थान का सबसे बड़ा लिविंग फोर्ट है।
    • चित्तौड़गढ़ दुर्ग में गौमुख कुंड के पास रानी पद्मिनी का जौहर स्थल स्थित है।
    • चित्तौड़गढ़ दुर्ग में नौगजा पीर की कब्र भी स्थित है।
    • चित्तौड़गढ़ दुर्ग पर पहला आक्रमण अफगानिस्तान के सूबेदार मामू ने किया था।
    • चित्तौड़गढ़ दुर्ग को जितने के लिए अकबर को जयमल एवं फत्ता के प्रबल विरोध का सामना करना पड़ा था।
    • चित्तौड़गढ़ दुर्ग के रास्ते में उदयसिंह के वीर सेनापति जयमल एवं पता की छतरियां स्थित है।
    • चित्तौड़गढ़ दुर्ग व्हेल मछली के आकार में बना हुआ है।
    • चित्तौड़गढ़ दुर्ग में विजय स्तंभ, कुंभ श्याम मंदिर, तुलजा भवानी का मंदिर, भीम कुंड, रानी पद्मिनी का महल, मीराबाई का मंदिर आदि स्थित है।
    • चित्तौड़गढ़ के किले के सात दरवाजे - भैरवपोल, गणेशपोल, पाडनपोल, हनुमानगढ़, जोडलापोल, रामपोल एवं लक्ष्मणपोल है।
    • चित्तौड़गढ़ दुर्ग राजस्थान का एकमात्र ऐसा दुर्ग है जिसमें खेती की जाती है।
    • चित्तौड़गढ़ दुर्ग में जलापूर्ति के मुख्य स्रोत - रत्नेश्वर तालाब, गोमुख झरना, कुम्भ सागर, हाथीकुंड, झालीबाव तालाब, चित्रांग मोरी तालाब, भीमलत तालाब आदि।
    • चित्तौड़गढ़ दुर्ग को वर्ष 2013 में 'यूनेस्को की विश्व विरासत' स्थलों की सूची में शामिल किया गया।

     चित्तौड़गढ़ दुर्ग में स्थित दर्शनीय स्थल :-  

    1. विजय स्तम्भ :-
    • विजय स्तंभ का निर्माण - विजय स्तंभ का निर्माण महाराणा कुंभा द्वारा मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी के खिलाफ 1437 ईस्वी में सारंगपुर विजय के उपलक्ष में महान वास्तुशिल्पी मंडन के मार्गदर्शन में 1440 से 1448 के मध्य करवाया गया था।
    • विजय स्तंभ के उपनाम - हिंदू मूर्तिकला का विश्वकोश, विक्ट्री टावर, मूर्तियों का अजायबघर, भारतीय मूर्तिकला का विश्वकोश, विष्णु ध्वज आदि।
    • यह विजय स्तंभ 9 मंजिला है। इसकी आठवीं मंजिल पर "अल्लाह " शब्द खुदा हुआ है तथा इसकी तीसरी मंजिल पर 9 बार अल्लाह शब्द अरबी भाषा में लिखा हुआ है।
    • यह विजय स्तम्भ डमरु के आकार का है।
    • विजय स्तंभ का आधार 30 फीट है, ऊंचाई 122 फीट है, मंजिले 09, सीढ़ियां 157 है।
    • कर्नल जेम्स टॉड ने विजय स्तम्भ के बारे में कहा - "यह क़ुतुब मीनार से भी बेहतरीन इमारत है"|
    • विजयस्तम्भ को कर्नल जेम्स तोड़ ने 'रोम का टार्जन' की उपमा दी है।
    • विजय स्तंभ के शिल्पकार - जेता और उसके पुत्र नापा, पूंजा और पोमा।

    2. कुंभ श्याम मंदिर एवं कालिका माता मंदिर :-
    • चित्तौड़गढ़ दुर्ग में कुंभ श्याम मंदिर व कालिका माता मंदिर (गुहिल वंश की इष्ट देवी ) का निर्माण आठवीं सदी में हुआ था।
    • कुंभ श्याम मंदिर प्रतिहारकालीन  मंदिर है।
    • ये दोनों मंदिर महामारू शैली के हैं।
    • महाराणा कुंभा ने कुंभ श्याम मंदिर का जीर्णोद्धार 15वीं सदी में करवाया था। 

    3. राणी पद्मिनी का महल :-
    • महाराणा रतनसिंह की पत्नी का नाम रानी पद्मिनी था और वह अपने सौन्दर्य के लिए विख्यात थी।
    • पद्मिनी को पाने के लिए ही अलाउद्दीन खिलजी ने 1303 में चित्तौड़ पर आक्रमण किया था। इसी के नाम पर यह पद्मिनी महल बनाया गया है।
    • पद्मिनी महल के पास ही पद्मिनी तालाब तथा जल के मध्य में एक जल महल भी बना हैं।

    4. तुलजा भवानी मंदिर :-
    • तुलजा भवानी माता के इस मंदिर का निर्माण उड़ना राजकुमार पृथ्वीराज के दासी पुत्र बनवीर ने चित्तौड़गढ़ दुर्ग के अंतिम द्वार रामपोल से दक्षिण की ओर करवाया था।
    • तुलजा भवानी मंदिर के पास पुरोहित जी की हवेली भी स्थित है।
    • तुलजा भवानी छत्रपति शिवाजी की आराध्य देवी थी।

    5. मीरा बाई का मंदिर :-
    • मेवाड़ के राणा सांगा के द्वितीय पुत्र भोज की पत्नी मीराबाई के इस मंदिर में मीरा की प्रतिमा के स्थान पर केवल एक तस्वीर लगी हुई हैं।
    • मीरा बाई के मंदिर सामने उनके गुरु संत रैदास की छतरी है।
    • मीरा बाई का मंदिर चित्तौड़गढ़ दुर्ग में इंडो-आर्य शैली में निर्मित है।
    • मीराबाई श्री कृष्ण की परम भक्त थी। 

    6. जैन कीर्ति स्तंभ :-
    • जैन कीर्ति स्तंभ का निर्माण - जैन कीर्ति स्तंभ का निर्माण दिगंबर जैन महाजन जीजाक द्वारा करवाया गया था।
    • जैन कीर्ति स्तंभ जैन धर्म के प्रथम जैन तीर्थंकर आदिनाथ को समर्पित है।
    • जैन कीर्ति स्तंभ चित्तौड़गढ़ दुर्ग में स्थित है।
    • जैन कीर्ति स्तंभ सात मंजिला इमारत है।
    • कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति की शुरुआत अत्रि ने की  तथा समाप्त उसके पुत्र महेश भट्ट ने की। 

    7. श्रृंगार चंवरी :-
    • शांतिनाथ जैन मंदिर जिसका निर्माण महाराणा कुंभा के कोषाधिपति के पुत्र वेल्का ने चित्तौड़गढ़ किले में करवाया था।
    • यह मंदिर राजपूत व जैन स्थापत्य कला का उत्कृष्ट नमूना है। यहां कुंभा की पुत्री रमाबाई की चवरी बनी हुई है। 

    अन्य स्थल :-
    • गोरा-बादल महल
    • भीमलत कुंड
    • नवलक्खा बुर्ज
    • चित्रांग मोरी तालाब
    • जयमल मेड़तिया एवं कल्ला राठौड़ की छतरियां

     चित्तौड़गढ़ दुर्ग के तीन साके :- 

    • चित्तौड़गढ़ दुर्ग का प्रथम साका : अलाउद्दीन खिलजी ने 1303 ईस्वी में चित्तौड़गढ़ दुर्ग पर आक्रमण किया। जिसमें रतनसिंह ने केसरिया किया था तथा उसकी रानी पद्मिनी ने 1600 महिलाओं के साथ जौहर किया था। रानी पद्मिनी सिंहल द्वीप के राजा गंधर्वसेन की पुत्री थी। इसमें रतनसिंह के सेनापति गौरा एवं बादल वीरगति को प्राप्त हुए। इसके बाद अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़गढ़ का नाम बदलकर अपने पुत्र के नाम पर खिज्राबाद रखा था तथा अलाउद्दीन ने इस दुर्ग की जिम्मेदारी अपने पुत्र खिज्र खां को सौपी। यह मेवाड़ का प्रथम साका तथा राजस्थान का दूसरा साका था। राजस्थान का प्रथम साका रणथम्भौर दुर्ग का है।
    • चित्तौड़गढ़ दुर्ग का द्वितीय साका : गुजरात के बहादुरशाह ने 1534-35 में चित्तौड़गढ़ दुर्ग पर आक्रमण किया। उस समय चित्तौड़गढ़ पर विक्रमादित्य का शासन था। रानी कर्मावती ने हुमायु को राखी भेजकर सहायता मांगी, परन्तु सही समय पर सहायता नहीं की। रानी कर्मावती ने दुर्ग की जिम्मेदारी बाघसिंह को सौपी। बाघसिंह पाडनपोल दरवाजे के बाहर लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। इस प्रकार बाघसिंह ने केसरिया एवं रानी कर्मावती ने जौहर किया था।
    • चित्तौड़गढ़ दुर्ग का तृतीय साका : अकबर ने 1568 चित्तौड़गढ़ दुर्ग पर आक्रमण किया था। उस समय चित्तौड़गढ़ पर उदयसिंह का शासन था। उदयसिंह दुर्ग की जिम्मेदारी अपने दो सेनापति जयमल एवं फत्ता को सौपकर गोगुन्दा चले गए। इसमें जयमल, फत्ता एवं जयमल के भतीज कल्लाजी ( चार हाथ के लोकदेवता) ने केसरिया एवं फत्ता की पत्नी फूलकंवर ने जौहर किया था।

    शेरगढ़ का किला (Shergarh Fort)

    • शेरगढ़ दुर्ग का निर्माण - शेरगढ़ दुर्ग का निर्माण कुषाण वंश के शासक मालदेव ने 1540 ईसवी में चम्बल नदी के मुहाने पर करवाया था। पाल वंश के शासक धोरपाल अथवा देवीपाल ने 11वीं शताब्दी में इस दुर्ग का पुनर्निर्माण करवाया तथा बाद में शेरशाह सूरी ने इस दुर्ग को पुन: बनवाया था एवं इसका जीर्णोद्धार करवाया था। शेरशाह के नाम पर ही इस दुर्ग का नाम शेरगढ़ पड़ा।
    • शेरगढ़ दुर्ग के उपनाम - दक्षिण/दक्खिन का द्वारगढ़, धोलदेहरागढ़, धौलपुर दुर्ग आदि।
    • शेरगढ़ का किला धौलपुर के प्रथम राजा कीरतसिंह की राजधानी था।
    • शेरगढ़ दुर्ग राजस्थान का एकमात्र ऐसा दुर्ग है जो राजस्थान, मध्यप्रदेश एवं उत्तरप्रदेश की सीमाओं पर स्थित है।
    • शेरगढ़ दुर्ग सांप्रदायिक सद्भाव के लिए भी जाना जाता है। ध्यान रहे - शेरगढ़ दुर्ग/किला के नाम से एक अन्य किला बारां जिले में भी स्थित हैं। 

    सिवाना दुर्ग (Siwana Fort)

    • सिवाना दुर्ग के उपनाम - जालौर दुर्ग की कुंजी, मारवाड़ के राजाओं की शरण स्थली, खैराबाद, मारवाड़ के राजाओं की संकटकालीन राजधानी आदि।
    • "मारवाड़ के शासकों की शरणस्थली" सिवाना दुर्ग बाड़मेर के सिवाना क्षेत्र में छप्पन की पहाड़ियां की हल्देश्वर पहाड़ी पर वीर नारायण पवार द्वारा निर्मित है।
    • सिवाना दुर्ग में जयनारायण व्यास को बंदी बनाकर रखा गया।
    • सिवाना दुर्ग को  कुमट दुर्ग भी कहा जाता है।
    • सिवाना दुर्ग में दो साके हुए थे।
    • सिवाना दुर्ग का प्रथम साका - 1308 ईस्वी में कमालुद्दीन गर्ग के नेतृत्व में अलाउद्दीन की सेना ने सिवाना दुर्ग पर आक्रमण किया था। उस समय सिवाना का शासक शीतलदेव/सातलदेव (कान्हड़देव का भतीजा) था। शीतलदेव के पुत्र का नाम सोम था। शीतलदेव का वीर सेनापति भावले पंवार था। काफी समय बीत जाने के बावजूद अलाउद्दीन की सेना सिवाना दुर्ग को अपने कब्जे में नहीं ले सकी। फिर उन्होंने छल-कपट करके शीतलदेव के सेनापति भावले पंवार को लालच देकर अपने पक्ष में कर लिया और भावले पंवार से अलाउद्दीन की सेना ने दुर्ग के गुप्त रास्ते पता किये। जिससे वे दुर्ग में प्रवेश करने में सफल हुए। शीतलदेव एवं सोम लड़ते हुए वीर गति को प्राप्त हुए और दुर्ग की ललनाओं ने जौहर किया था। अलाउद्दीन खिलजी की सेना ने दुर्ग के प्रमुख पेयजल स्रोत भांडेलाव तालाब में गौमांस/गौरक्त मिलकर पेयजल को दूषित कर दिया था। अलाउद्दीन खिलजी द्वारा सिवाना दुर्ग को जीत लिए जाने के बाद इसका नाम बदलकर खैराबाद रख दिया गया। 
    • सिवाना दुर्ग का दूसरा साका - सन 1600 के आस-पास मुग़ल बादशाह अकबर ने जोधपुर के मोटाराजा  उदयसिंह के नेतृत्व में सिवाना के शासक वीर कल्ला रायमलोत(कल्याणमल) पर आक्रमण किया था। जिसमे वीर कल्ला लड़ते हुए वीर गति को प्राप्त हुए थे और उनकी हाड़ी रानी ने दुर्ग की अन्य स्त्रियों के साथ जौहर किया था। यह सिवाना का दूसरा साका था।

    बूंदी का किला/तारागढ़ दुर्ग

    • बूंदी के किले को तारागढ़/तिलस्मी किला आदि नामों से जाना जाता है।
    • बूंदी किले का निर्माण - बूंदी किले का निर्माण देवीसिंह हाडा/बरसिंह हाड़ा ने 14 वीं शताब्दी में करवाया था।
    • बूंदी दुर्ग के बारे  में रुडयार्ड क्लिपिंग ने कहा कि "ये दुर्ग मानव ने नहीं बल्कि प्रेतों द्वारा बनाया लगता है"
    • बूंदी दुर्ग अपने भित्ति चित्रों के लिए प्रसिद्ध है।
    • बूंदी किले में गर्भ गुंजन तोप रखी हुई है।
    • भीम बुर्ज और रानी जी की बावड़ी (राव अनिरूद्ध सिंह द्वारा निर्मित) इस दुर्ग मे स्थित हैं।
    • रंग विलास (चित्रशाला) इस दुर्ग में स्थित हैं। रंग विलास चित्रशाला का निर्माण उम्मेद सिंह हाड़ा ने किया।
    • तारागढ़ दुर्ग, बूंदी के दर्शनीय स्थल - छत्र महल, दिवान-ए-आम, नौबत खाना, रतन महल, अनिरुद्ध  महल,फूल  महल, बादल महल, सिलहखाना आदि स्थापत्य कला के उत्कृष्ट नमूने है।

    अजयमेरु दुर्ग (तारागढ़ दुर्ग)

    • तारागढ़ दुर्ग का निर्माण अजयपाल ने सातवीं सदी में करवाया था।
    • तारागढ़ दुर्ग में कुल 14 बुर्ज है।
    • तारागढ़ दुर्ग सर्वाधिक आंतरिक आक्रमण सहने वाला दुर्ग है।
    • तारागढ़ दुर्ग की घाटी में 'चश्म-ए-नूर' महल का निर्माण जहांगीर ने करवाया था।
    • अजयमेरु दुर्ग की प्राचीर की विशाल बुर्जों के नाम - गुगड़ी, बांदरा, घूंघट एवं इमली।
    • तारागढ़ दुर्ग में शाहजहां के बेटे दाराशिकोह का जन्म हुआ था। दाराशिकोह ने धौलपुर के युद्ध में पराजित होकर इस दुर्ग में शरण ली थी।
    • अजयमेरु दुर्ग के उपनाम :-अजयमेरू दुर्ग, तारागढ़ दुर्ग , गढ़ बिठली दुर्ग, राजपूताना की कुंजी, राजस्थान का जिब्राल्टर ( बिशप हेबर ) |
    • गढ़ बिठली दुर्ग में दर्शनीय स्थल :-  मिरान साहब की दरगाह, घोड़े की मजार, रूठी रानी का महल, पृथ्वीराज स्मारक, नानाजी का झालरा, चामुंडा माता का मंदिर आदि।

    आमेर का किला/दुर्ग 

    • आमेर किले के उपनाम - अम्बावती नगरी/अम्बरीशपुर/अंबर दुर्ग आदि।
    • आमेर के किले का निर्माण 1150 ईस्वी में दूल्हेराय ने करवाया था तथा इसका पुनर्निर्माण मानसिंह प्रथम ने करवाया था।
    • आमेर के किले में प्रसिद्ध मावठा जलाशय एवं दिलाराम का बाग़ स्थित है।
    • आमेर किले में प्रमुख दर्शनीय स्थल - शिलादेवी माता मंदिर, शीशमहल, सुहाग मंदिर, मावठा झील, भूल-भुलैया, केसर क्यारी, दीवाने आम, दीवाने खाश महल आदि प्रसिद्ध दर्शनीय स्थल है।
    • आमेर किले के जनाना देहरी भाग में रानी माताएं और राजाओं की रानियां रहती थी।
    • आमेर दुर्ग को जून, 2013 में यूनेस्को की विश्व विरासत स्थल सूची में शामिल किया गया। 

    जयगढ़ दुर्ग, जयपुर

    • जयगढ़ दुर्ग के उपनाम - चिल्ह का टीला, संकटमोचक दुर्ग आदि।
    • जयगढ़ दुर्ग (जयपुर) का निर्माण 16 वीं शताब्दी में मानसिंह प्रथम ने करवाया था। जयगढ़ दुर्ग को वर्तमान स्वरूप सवाई जयसिंह द्वारा 1726 ईस्वी में दिया गया।
    • जयगढ़ दुर्ग का वास्तुकार विद्याधर भट्टाचार्य (जयपुर शहर के वास्तुकार भी ) थे।
    • मिर्जा राजा जयसिंह द्वारा जयगढ़ दुर्ग का निर्माण चिल्ह का टीला नामक पहाड़ी पर करवाया गया था। मिर्जा राजा जयसिंह के नाम पर भी इस दुर्ग का नाम जयगढ़ दुर्ग पड़ा।
    • जयगढ़ दुर्ग भारत का एकमात्र दुर्ग है, जहां तोप  ढालने का एशिया का सबसे बड़ा कारखाना मिर्जा राजा जयसिंह ने स्थापित करवाया था। इस कारखाने में सवाई जयसिंह ने जयबाण/रणबंका तोप बनाई थी, जो एशिया की सबसे बड़ी तोप ( जयबाण तोप की नाली की लम्बाई 20.2 फुट है। ) थी। जयबाण तोप को एकबार चलाया गया तो उसकी गर्जना इतनी तेज थी कि पशु-पक्षिओं एवं महिलाओं के गर्भपात हो गए तथा उसका गोला चाकसू में गिरा जहां गोलेराव नामक तालाब बन गया।
    • जयगढ़ दुर्ग में एक और लघु दुर्ग विजयगढ़ी दुर्ग है, जहां पहले राजकीय खजाना व कैदियों को रखा जाता था। विजयगढ़ी के पास ही तिलक की तिबारी स्थित है, जिसके चौक में जयबाण तोप रखी गयी है।
    • जयगढ़ दुर्ग के पास सात मंजिला प्रकाश स्तम्भ स्थित हैं, जिसे दिवाबुर्ज कहते है, यह सबसे ऊँचा बुर्ज है। 
    • जयगढ़ दुर्ग के प्रमुख दरवाजे - डूंगर द्वार, भैरु द्वार तथा अवनि द्वार है।
    • ऐसा माना जाता है की आमेर के कच्छवाहा वंश का दफीना (राजकोष)/धन-दौलत इस दुर्ग में रखा हुआ था, जिसकी खुदाई एवं खोज 1975 में इंदिरा गाँधी ने करवाई थी। 

    नाहरगढ़ दुर्ग/किला

    • नाहरगढ़ दुर्ग  का निर्माण - नाहरगढ़ दुर्ग  का निर्माण महाराजा सवाई जयसिंह ने 1734 ईस्वी में मराठों के डर से करवाया था। इस दुर्ग का  पुन: निर्माण एवं वर्तमान स्वरूप सवाई जयसिंह ने 1867 ईस्वी में करवाया था।
    • नाहरगढ़ दुर्ग के प्रमुख उपनाम - जयपुर का मुकुट, सुदर्शनगढ़ (मूलनाम), जयपुर ध्वजगढ़, मीठड़ी का किला, सुलक्षण दुर्ग, टाइगर किला, महलों का दुर्ग आदि।
    • इसका नाहरगढ़ नाम लोकदेवता नाहरसिंह भोमिया के नाम पर पड़ा है, जिनका स्थान किले की प्राचीर में प्रवेश द्वार के निकट बना हुआ है।
    • नाहरगढ़ दुर्ग में माधोसिंह ने अपनी 9 रानियों के लिए 9 महल "विक्टोरिया शैली" में बनवाये थे। 

    गागरोन दुर्ग (जलदुर्ग)

    • गागरोन दुर्ग के उपनाम - डोडगढ़, जलदुर्ग, मुस्तफाबाद, धूलरगढ़, उदकगढ़, गर्गराटपुर आदि।
    • गागरोन दुर्ग का निर्माण - गागरोन दुर्ग का निर्माण 7-8 वीं शताब्दी में कालीसिंध एवं आहू नदियों के संगम पर मुकुंदरा पहाड़ी पर डोडा राजपूत (परमार) ने करवाया था।
    • गागरोन दुर्ग में प्रसिद्ध सूफी संत हमीमुद्दीन मीठे शाह की दरगाह स्थित है।
    • गागरोन दुर्ग राजस्थान का बिना नींव के एक चट्टान पर सीधा खड़ा एकमात्र दुर्ग है। इस दुर्ग में दो साके हुए थे।

     गागरोन दुर्ग के प्रमुख साके :-

    • गागरोन दुर्ग का पहला साका - मांडू सुल्तान अलपखां एवं अचलदास खींची के बीच 1423 ईस्वी में युद्ध हुआ था। इसमें अचलदास वीरगति को प्राप्त हो गए (केसरिया) तथा अचलदास की रानी उमादे सहित दुर्ग की सभी ललनाओं ने जौहर किया था। शिवदास गाडण द्वारा कृत 'अचलदास खींची री वचनिका' में इस युद्ध का वर्णन मिलता है।
    • गागरोन दुर्ग का दूसरा साका - मांडू के सुल्तान महमूद खिलजी प्रथम एवं अचलदास खींची के पुत्र पाल्हणसी के मध्य युद्ध हुआ था। इसमें भी मांडू के सुल्तान महमूद खिलजी प्रथम की विजय हुई थी।

    जूनागढ़ किला/बीकानेर का किला

    • जूनागढ़ दुर्ग "धान्वन दुर्ग एवं भूमि दुर्ग" की श्रेणी के अंतर्गत आता है।
    • जूनागढ़ दुर्ग के उपनाम - बीकानेर का किला, राती-घाटी का किला, जमीन का जेवर, अधगढ किला आदि।
    • जूनागढ़ किला प्राचीन दुर्ग 'बीका की टेकरी' के स्थान पर सन 1594 ईसवी में राजा रायसिंह द्वारा बनवाया गया था।
    • जूनागढ़ दुर्ग लाल पत्थरों से बना दुर्ग है।
    • जयगढ़ दुर्ग में सुरसिंह ने सूरसागर झील बनवाई और इसके जीर्णोद्वार करवाकर वसुंधरा राजे ने 15 अगस्त, 2008 को नौकायन का उद्घाटन किया था।
    • इस दुर्ग में जैइता मुनि द्वारा रचित रायसिंह प्रशस्ति स्थित है।
    • इस किले में फूल महल, करण महल, चंद्र महल, अनूप महल, बादल महल, हेरम्भ गणपति मंदिर, सरदार निवास महल स्थित है।
    • जूनागढ़ दुर्ग के मुख्य प्रवेश द्वार को करणपोल कहा जाता है।
    • सूरजपोल की एक विशेष बात यह है कि इसके दोनों तरफ 1567 ई. के चित्तौड़ के साके में वीरगति पाने वाले दो इतिहास प्रसिद्ध वीरों जयमल मेडतियां और उनके बहनोई आमेर के रावत पता सिसोदिया की गजारूढ मूर्तियां स्थापित है।

    जालोर दुर्ग (Jalore Fort)

    • जालौर दुर्ग के उपनाम - सुवर्णगिरी दुर्ग, कांचनगिरी दुर्ग, जालंधर दुर्ग, सोनगिरी दुर्ग, जलालाबाद दुर्ग, सोनारगढ़ दुर्ग, जाबालीपुर आदि।
    • जालौर दुर्ग के बारे में हसन निजामी ने कहा है, कि यह एक ऐसा किला है, जिसका दरवाजा कोई भी आक्रमणकारी खोल नहीं सका।
    • औझा के अनुसार इस दुर्ग का निर्माण परमारों ने करवाया था। दशरथ शर्मा के अनुसार इस दुर्ग का निर्माण प्रतिहार शासक नागभट्ट प्रथम ने सुकड़ी नदी के किनारे करवाया था।
    • जालौर में सुकड़ी नदी के निकट सुवर्णगिरि पहाड़ी पर बना यह दुर्ग पश्चिमी राजस्थान का सबसे प्राचीन व सबसे सुदृढ़ दुर्ग है।
    • जालौर दुर्ग में चामुंडा माता, जोगमाया माता का मंदिर स्थित है। इनके साथ-साथ इस किले में अलाउद्दीन खिलजी एवं मलिक साहब की दरगाह/मस्जिद, परमार कालीन कीर्ति स्तम्भ स्थित है।
    • जालोर दुर्ग का साका/जालोर का युद्ध - सन 1311 ईसवी में अलाउद्दीन खिलजी ने जालौर दुर्ग पर आक्रमण किया था। उस समय वहां का शासक का कान्हड़देव था। अलाउद्दीन खिलजी हर तरीके से दुर्ग को फतह करने में नाकाम रहा था। फिर उन्होंने कान्हड़देव के सेनापति दहिया बिका को लालच देकर गुप्त रास्तों का पता कर जालौर दुर्ग पर आक्रमण किया। जिसमें कान्हड़देव वीरगति को प्राप्त हुए थे तथा उनके पुत्र वीरमदेव ने अपनी कुलदेवी आशापुरा माता के सामने कटार घोंप कर आत्महत्या कर दी थी। इस प्रकार इन वीरों ने केसरिया किया था तथा कान्हड़देव की रानी जैतल दे जोहर किया था। इसके बाद अलाउद्दीन खिलजी ने जालौर का नाम बदलकर जलालाबाद रखा था। 

    भटनेर दुर्ग (Bhatner Fort)

    • भटनेर  दुर्ग का निर्माण - भटनेर  दुर्ग का निर्माण 285  ईस्वी/तीसरी शताब्दी में घग्घर नदी के मुहाने पर भाटी नरेश भूपत द्वारा करवाया गया था।  इस दुर्ग का शिल्पी कैकेया था।
    • बीकानेर के शासक सूरतसिंह ने भटनेर दुर्ग पर मंगलवार को अधिकार किया था और उन्होंने मंगलवार (हनुमानजी का दिन) होने के कारण इसका नाम हनुमानगढ़ कर दिया था) |
    • भटनेर दुर्ग राजस्थान का सबसे प्राचीन दुर्ग है।
    • भटनेर दुर्ग के उपनाम - उत्तरी भड़-किवाड़, हनुमानगढ़ दुर्ग, उत्तरी सीमा का प्रहरी, बांकागढ़ आदि। 
    • भटनेर दुर्ग पर सर्वाधिक विदेशी आक्रमण हुए।
    • भटनेर दुर्ग का पुनर्निर्माण 12वीं सदी में अभयराव ने करवाया था।
    • भटनेर दुर्ग के बारे में तैमूर ने अपनी आत्मकथा "तुजुक-ए-तैमूरी" में लिखा था कि "मैंने इतना मजबूत व सुरक्षित किला पुरे हिंदुस्तान में कहीं नहीं देखा"
    • इस दुर्ग में शेर खान की कब्र स्थित है। गोरखनाथ मंदिर भी इसी दुर्ग में स्थित है। 

    कुंभलगढ़ दुर्ग ( Kumbhalgarh Fort)

    • कुंभलगढ़ दुर्ग का निर्माण - कुंभलगढ़ दुर्ग का निर्माण 1443 ईस्वी से 1456 ईसवी के मध्य राजसमंद जिले के सादड़ी गांव के पास अरावली की जरगा पहाड़ी पर महाराणा कुंभा ने अपनी पत्नी कुम्भलदेवी की स्मृति में करवाया था।
    • कुंभलगढ़ दुर्ग का वास्तुकार/शिल्पी मंडन था।
    • कुंभलगढ़ दुर्ग की दीवार की लंबाई 36 किलोमीटर है तथा इसकी चौड़ाई (7 मीटर) इतनी है कि उस पर 4 घुड़सवार एक साथ चल सकते हैं। इसलिए कुंभलगढ़ दुर्ग की प्राचीर को भारत की महान दीवार कहते हैं। पृथ्वीराज सिसोदिया का बचपन इसी दुर्ग में गुजरा था तथा यहीं पर उसकी 12 खंभों की छतरी भी स्थित है।
    • कुंभलगढ़ दुर्ग के प्रमुख उपनाम - कुंभपुर, कमलमीर, संकटकाल में मेवाड़ के राजाओं की शरण स्थली, कुंभलमेऊ, मच्छेंद्र आदि।
    • कुंभलगढ़ दुर्ग भारत के सबसे विशाल दुर्गों में से एक है, जो लगभग 268 हेक्टेयर (1.03 वर्ग मील) के क्षेत्रफल में फैला हुआ है।
    • कर्नल जेम्स टॉड ने इस दुर्ग के सुदृढ़ बना होने के कारण इसे एस्ट्रुस्कन की उपमा दी है।
    • कुम्भलगढ़ दुर्ग के बारे में अबुल फजल ने लिखा है कि यह दुर्ग इतनी बुलंदी पर बना है कि नीचे से ऊपर की ओर देखने पर सिर से पगड़ी गिर जाती है।
    • कुंभलगढ़ दुर्ग में ही उदय सिंह का 1537 ईस्वी में राज्याभिषेक हुआ था।
    • कुंभलगढ़ दुर्ग के भीतर कुंभा का निवास स्थान कटारगढ़ कहलाता है। जिसमें महाराणा कुंभा रहकर मेवाड़ के साम्राज्य की देखरेख करता था। इसलिए इस कटारगढ़ दुर्ग को मेवाड़ की आंख भी कहा जाता है। इसी कटारगढ़ दुर्ग में 1540 ईसवी में महाराणा प्रताप का जन्म हुआ था। कटारगढ़ के उत्तर में झालीबाव बावड़ी तथा मामादेव का कुंड है जहां पर कुंभा की हत्या पुत्र उदा ने की थी।
    • कुंभलगढ़ दुर्ग के पूर्व में हाथिया गुड्डा की नाल है तथा कुंभलगढ़ किले की तलहटी में महाराणा रायमल के बड़े पुत्र पृथ्वीराज की छतरी बनी हुई है। पृथ्वीराज को उड़ना राजकुमार के नाम से भी जाना जाता है।
    • महाराणा सांगा की मृत्यु के बाद मेवाड़ राजपरिवार की स्वामीभक्त पन्नाधाय ने उदय सिंह को बनवीर से बचाने के लिए अपने पुत्र चंदन की बलि दी तथा वहां से उदय सिंह को लेकर पन्नाधाय कुंभलगढ़ के किलेदार आशादेवपुरा के पास चली गई और कुम्भलगढ़ दुर्ग में उसका लालन-पालन किया था। बाद में इसी कुंभलगढ़ दुर्ग से महाराणा उदय सिंह का राज्याभिषेक हुआ था।
    • 1537 ईस्वी में कुंभलगढ़ दुर्ग से राज्याभिषेक होने के बाद बनवीर को परास्त कर उदयसिंह ने पुन: चित्तौड़ पर अधिकार कर लिया था।
    • महाराणा प्रताप ने कुंभलगढ़ से ही मेवाड़ का शासन प्रारंभ किया था

    लोहागढ़ दुर्ग (Lohagarh Fort)

    • लोहागढ़ दुर्ग के उपनाम - भरतपुर दुर्ग, लोहागढ़ दुर्ग, मिट्टी का किला, अभेद्य दुर्ग, अजयगढ़ दुर्ग, पूर्वी सीमांत का प्रहरी किला।
    • लोहागढ़ दुर्ग का निर्माण - लोहागढ़ दुर्ग का निर्माण सन 1733 में सूरजमल जाट (जाटों का प्लेटो/जाटों का अफलातून आदि उपनाम से प्रसिद्ध) ने करवाया था।
    • "आठ फिरंगी नौ गोरा लड़े जाट का दो छोरा" व "हट जा गोरा पाछ न" (यह दो छोरा दुर्जनलाल और माधोसिंह थे) आदि कहावतें इस दुर्ग के लिए प्रसिद्ध है।
    • लोहागढ़ दुर्ग में जवाहर बुर्ज व फतेह बुर्ज बनाए हुए हैं। महाराजा जवाहरसिंह ने 1765 में मुगलों से दिल्ली विजय के उपलक्ष में  जवाहर बुर्ज का निर्माण करवाया था तथा अंग्रेजों पर विजय के उपलक्ष महाराजा रणजीतसिंह ने फतेह बुर्ज 1806 में बनवाया था।
    • लोहागढ़ दुर्ग में अष्ट धातु के किवाड़ लगे हुए हैं।
    • इस दुर्ग में राजेश्वरी माता (भरतपुर वंश की कुलदेवी) का मंदिर  व बिहारी मंदिर स्थित है।
    • यह दुर्ग राजस्थान का एकमात्र ऐसा दुर्ग है जिस पर अंग्रेज जनरल लार्ड लैक  ने 5 बार चढ़ाई की किंतु असफल रहा।

    बयाना दुर्ग (Bayana Fort)

    • बयाना दुर्ग के प्रमुख उपनाम - बाणासुर का किला,  विजयगढ़ दुर्ग,  बादशाह दुर्ग,  श्रीपंथ दुर्ग,   श्रीपुर दुर्ग आदि।
    • मानी (दमदमा) पहाड़ी पर लगभग 1040 ईस्वी में निर्मित इस दुर्ग  का निर्माण यादव राजवंश के महाराजा विजयपाल ने करवाया था। इस दुर्ग में भीम लाट बनी हुई है, जो लाल पत्थरों से निर्मित है। इसे विष्णु वर्धन ने बनवाया था। यहां पर लोदी मीनार भी स्थित है जिसे इब्राहिम लोदी ने बनवाया था।
    • बयाना को कब्रगाहों का शहर भी कहते हैं।
    • इसी बयाना दुर्ग में महाराजा सूरजमल का राज्याभिषेक भी हुआ था।
    • इस दुर्ग में अकबर की छतरी स्थित है।

    मेहरानगढ़ दुर्ग (Meharangarh Fort)

    • मेहरानगढ़ दुर्ग का निर्माण - मेहरानगढ़ दुर्ग का निर्माण 1459 ईस्वी में राव जोधा ने करवाया था। इस दुर्ग की नींव का पत्थर करणी माता (रिद्धि बाई) ने रखा था।
    • मेहरानगढ़ दुर्ग के उपनाम - सूर्यगढ़, चिड़िया टूंक दुर्ग, मयूरध्वजगढ़, गढ़ चिंतामणि, कागमुखी आदि।
    • मेहरानगढ़ दुर्ग में प्रमुख दर्शनीय स्थल - चामुंडा माता का मंदिर (राव जोधा द्वारा निर्मित), नागणेची माता का मंदिर (जोधपुर के राठौड़ राजवंश की कुलदेवी), सूरी मस्जिद, भूरे खां की मजार, मानप्रकाश पुस्तकालय, कीरत सिंह एवं धन्ना की छतरियां, फूलमहल (अभयसिंह द्वारा निर्मित), मोतीमहल, जहूर खान की मजार आदि।
    • मेहरानगढ़ दुर्ग में गजनी खां, शंभूबाण तथा किलकिला नामक 3 तोपे पर रखी हुई है।
    • मेहरानगढ़ दुर्ग के बारे में रुडयार्ड क्लिपिंग ने कहा "इसका निर्माण शायद परियों व फरिस्तों ने किया है"
    • मेहरानगढ़ दुर्ग का शाही पुस्तकालय 'पुस्तक प्रकाश' भवन के नाम से जाना जाता है।
    • मेहरानगढ़ दुर्ग के साथ वीर शिरोमणि दुर्गादास, कीरतसिंह तथा दो अतुल पराक्रमी क्षत्रिय योद्धाओ - धन्ना और भींवा के बलिदान, पराक्रम, त्याग और स्वामिभक्ति की गौरव गाथाएं जुडी हुई है। जोधपुर के लोहापोल के पास इन योद्धाओं धन्ना और भींवा की 10 खम्भों की छतरी बनी हुई है। पूर्वी द्वार जयपोल के बाई ओर कीरतसिंह सोढा की छतरी स्थित है।

    रणथम्भौर दुर्ग (Ranthambore Fort)

    • रणथम्भोर दुर्ग का वास्तविक नाम - 'रन्त:पुर' जिसका शाब्दिक अर्थ होता है - रण की घाटी में स्थित नगर।
    • रणथम्भौर दुर्ग के उपनाम - दुर्गाधीराज, हम्मीरकी आन बान का प्रतीक, चित्तौड़गढ़ के किले का छोटा भाई आदि।
    • रणथम्भोर दुर्ग का निर्माण - रणथंबोर दुर्ग का निर्माण आठवीं शताब्दी में महेश्वर के ठाकुर रंतिदेव ने करवाया था। एक अन्य मत के अनुसार नागिल जाटों द्वारा 944 ईसवी में रणथम्भोर दुर्ग का निर्माण करवाया गया था।
    • रणथम्भोर दुर्ग का आकार अंडाकार है।
    • रणथम्भोर दुर्ग में प्रसिद्ध स्थल - जोहर महल, गणेश जी का मंदिर, जोरां-भोरां, हम्मीर महल, फौजी छावनी, पीर सदरुद्दीन की दरगाह, सुपारी महल, जोगी महल, बादल महल, रनिहाड़ तालाब, लक्ष्मी नारायण मंदिर आदि।
    • रणथम्भोर दुर्ग के प्रमुख दरवाजे - नौलखा दरवाजा, गणेश पोल, हाथीपोल, सूरजपोल, त्रिपोलिया दरवाजा आदि।
    • अबुल फजल ने कहा है कि 'अन्य सब दुर्ग तो नंगे है जबकि यह दुर्ग बख्तरबंद है' |
    • रणथम्भोर दुर्ग राजस्थान का एकमात्र ऐसा दुर्ग है जिसमें मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर स्थित है।
    • रणथम्भोर दुर्ग में 32 खंभों की छतरी (जिसे न्याय की छतरी का जाता है) स्थित है।
    • इस दुर्ग में गुप्त गंगा, त्रिनेत्र गणेश मंदिर स्थित है।
    • तराइन के द्वितीय युद्ध 1192 में अजमेर शासन पृथ्वीराज चौहान तृतीय के मोहम्मद गोरी के हाथों पराजित होने के बाद उसके पुत्र गोविंद राज ने यहां शासन स्थापित किया था।
    • रणथम्भोर दुर्ग का प्रथम साका - रणथम्भोर का सबसे प्रतापी एवं प्रसिद्ध शासक हम्मीर देव चौहान था। जिसने दिल्ली सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के विद्रोही सेनापति मुहमदशाह को शरण प्रदान की थी। जिस वजह से अलाउद्दीन खिलजी क्रोधित होकर 1300 ईस्वी में रणथम्भोर दुर्ग पर आक्रमण किया था। कई दिनों तक डेरा डालने के बाद भी सफल न होने पर अलाउद्दीन खिलजी छल-कपट से हम्मीर देव के दो विश्वस्त मंत्रियों को अपनी ओर झुका लेता है जिनसे दुर्ग के गुप्त रास्ते पता कर दुर्ग को भेद कर अंदर पहुंच गया था। राणा हम्मीर लड़ता हुआ वीरगति को प्राप्त होता है तथा हम्मीर की रानी रंगदेवी, अन्य रानियों एवं दुर्ग की स्त्रियों ने जोहर किया था। जुलाई 1301 ईस्वी में रणथंबोर दुर्ग पर अलाउद्दीन खिलजी का अधिकार हो गया था। यह शाखा राजस्थान का प्रथम शाखा था।
    • 1569 ईस्वी में मुगल बादशाह अकबर की सेना ने रणथम्भोर दुर्ग पर आक्रमण किया था परंतु विफल रहे। तब आमेर के शासक भगवंतदास के प्रयासों से रणथम्भोर दुर्ग के अधिपति बूंदी के राव सुरजन हाडा ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली एवं रणथम्भोर दुर्ग को अकबर को सौंप दिया था। अकबर ने रणथम्भोर को अजमेर सुबे का एक सरकार बना दिया था एवं यहां एक सिक्के ढालने की टकसाल स्थापित की थी।
    • रणथम्भौर दुर्ग के बारे में जलालुद्दीन ने कहा है कि "मैं ऐसे 10 दुर्गों को मुसलमान के एक बाल के बराबर भी नहीं समझता"
    • रणथम्भौर दुर्ग के बारे में अमीर खुसरो ने कहा है कि "कुफ्र का गढ़ इस्लाम का घर हो गया है" |

    राजस्थान के अन्य प्रमुख दुर्ग/किले

    • कांकणवाडी का किला - इस किले में ओरंगजेब ने अपने भाई दाराशिकोह को कैद करके रखा था। यह दुर्ग सरिस्का वन्य जीव अभ्यारण्य (अलवर) के जंगलों में स्थित है। इस दुर्ग का निर्माण जयपुर के महाराज सवाई जयसिंह द्वारा करवाया गया था।
    • अजबगढ़ दुर्ग - इसका निर्माण 1635 ईस्वी में अजबसिंह ने करवाया था।
    • नीमराना दुर्ग - इस दुर्ग का निर्माण 1464 ईस्वी में करवाया गया था। पांच मंजिला होने से इस दुर्ग को पंचमहल के नाम से भी जाना जाता है।
    • बीनादेसर का किला - बीनादेसर किले का निर्माण 1757 ईस्वी में ठाकुर दुल्लेसिंह (बीकानेर के राजा गंगासिंह के दीवान) द्वारा करवाया गया।
    • बसंतगढ़ दुर्ग - इस दुर्ग का निर्माण महाराणा कुम्भा ने पिंडवाड़ा(सिरोही) में करवाया था।
    • दौसा का किला - दौसा का किला देवगिरि की पहाड़ी (दौसा में ) पर सूप (छाजल) की आकृति में स्थित है। इस दुर्ग का निर्माण गुर्जर प्रतिहारों ने करवाया था। इस दुर्ग में हाथीपोल तथा मोरी दरवाजा नाम के दो दरवाजे है। दौसा कच्छवाहों की प्रारम्भिक राजधानी थी।
    • मांडलगढ़ दुर्ग - यह दुर्ग बनास, बेड़च एवं मेनाल नदियों के संगम स्थल पर स्थित है। इसका निर्माण चानणा गुर्जर ने करवाया था और इस दुर्ग का पुनर्निर्माण महाराणा कुम्भा ने करवाया था।
    • भैंसरोडगढ़ दुर्ग - इस दुर्ग का निर्माण भैंसाशाह व रोड़ा चारण ने करवाया था। यह दुर्ग चंबल व बामनी नदियों के संगम स्थल पर स्थित है। इसे राजस्थान का वेल्लोर व जल दुर्ग के उपनाम से जानते हैं। यह राजस्थान का एकमात्र दुर्ग है, जिसका निर्माण व्यापारी ने करवाया था।
    • कोटड़ा का किला - इस किले का निर्माण किराडू के परमार शासकों ने करवाया था। इस दुर्ग में सरगता कुंआ दर्शनीय है।
    • मंडरायल दुर्ग - इस दुर्ग को करौली दुर्ग/ग्वालियर दुर्ग की कुंजी कहते है। इसमें मर्दानशाह पीर की दरगाह स्थित है।
    • तिमनगढ़/त्रिभुवनगढ़ - यह मूर्ति तस्करी के कारण चर्चा में रहा है।
    • मैगजीन दुर्ग/अकबर का किला :- मैगजीन दुर्ग को अकबर का किला, शस्त्रागार, अकबर का दौलतखाना आदि उपनामो से जाना जाता है। मैगजीन दुर्ग का निर्माण अकबर ने करवाया था। मैगजीन दुर्ग मुस्लिम पद्धति पर बना एकमात्र दुर्ग है। इंग्लैंड के शासक जेम्स प्रथम के दूत सर टॉमस रो 22 दिसंबर, 1615 को अजमेर आए थे। उन्होंने अकबर के किले में 10 जनवरी, 1616 को जहांगीर से मुलाकात की थी।
    • केहरीगढ़ दुर्ग ( किशनगढ़, अजमेर ) :- केहरीगढ़ दुर्ग गुंदोलाव तालाब के पास किशनगढ़ अजमेर में स्थित है। वर्तमान में यह दुर्ग एक 'हेरिटेज होटल' है। इस दुर्ग के आंतरिक भाग को "जिवरक्खा महल" भी कहते है।
    • चौमू का किला - रघुनाथगढ़/चौमुहागढ/धराधारगढ़/सामंती दुर्ग आदि उपनामों से प्रसिद्ध चौमू दुर्ग निर्माण 1599 ईस्वी में ढूंढाड़ शैली में ठाकुर करणसिंह ने करवाया था। इस दुर्ग के पास सामोद हनुमानजी का मंदिर है। इसमें विराजमान प्रतिमा का एक पेअर पहाड़ी में धंसा हुआ है।
    • टॉडगढ़ दुर्ग:- इस दुर्ग का प्राचीन नाम - बोरासवाड़ा है। टॉडगढ़ दुर्ग का निर्माण कर्नल जेम्स टॉड ने करवाया था। इस दुर्ग में विजय सिंह पथिक और राव गोपाल सिंह खरवा को नजरबंद किया गया था।
    • माधोराजपुर का किला - माधोराजपुर दुर्ग का निर्माण सवाई माधोसिंह ने फागी तहसील (जिला - जयपुर ) के माधोराजपुरा गांव में मराठों पर विजयोपरांत करवाया था। इस दुर्ग में सवाई जयसिंह की धाय रूपा बढ़ारण को बंदी बनाकर रखा गया था। इस दुर्ग में अमीर खां पिंडारी की बेगम को पकड़कर लेन वाले भगतसिंह नरुका की वीरता की कहानी जुडी हुई है।
    • ककोड़ का किला - यह किला टोंक जिले में टोंक-सवाई माधोपुर मार्ग पर स्थित है।
    • पचेवर का किला - इस किले को चौबुर्जा का किला भी कहा जाता है। यह टोंक जिले के मालपुरा तहसील में स्थित है। यहां पाड़ा चक्की बनी हुई है।
    • अंसीरगढ़ दुर्ग - इसे दक्खिन की चाबी/भूमगढ़ आदि नामों से जाना जाता है। इसका निर्माण भोला ब्राह्मण ने शुरू किया था, जबकि आमिर खां से पूरा करवाया था।
    • शाहाबाद दुर्ग - इस दुर्ग का निर्माण चौहान राजा मुक्तामन (मुकुटमणिदेव) द्वारा मुकुंदरा पर्वत श्रेणी की भामती पहाड़ी पर सन 1521 में करवाया गया। इसमें सावन-भादो महल स्थित है। इस दुर्ग में 'कुंडा खोल' झरना (चश्मा) स्थित है। इस दुर्ग में 18 तोपें है, जिनमें से सबसे बड़ी तोप का नाम "नवलखा बाण तोप" है जो 19 फीट लंबी है।
    • कोषवर्द्धन किला - इसे जल दुर्ग/शेरगढ़ दुर्ग भी कहते है। यह दुर्ग परवन नदी के मुहाने पर स्थित है।
    • मनोहर थाना का किला - यह किला झालावाड़ में कालीखोह तथा परवन नदी के किनारे स्थित है। इस किले में शिव मंदिर एवं भीलो की आराध्य देवी विश्ववन्ति का मंदिर स्थित है।
    • नवलखा दुर्ग - इस दुर्ग की नींव झालावाड़ के झालरापाटन में पृथ्वी सिंह ने रखी थी।
    • लक्ष्मणगढ़ दुर्ग, सीकर - लक्ष्मणगढ़ दुर्ग का निर्माण राव राजा लक्ष्मण सिंह ने बेड़ नामक पहाड़ी पर करवाया था।
    • फतेहपुर दुर्ग, सीकर - फतेहपुर दुर्ग का निर्माण फतेह खां कायमखानी ने 1453 ईसवी में करवाया था। यह चौहान गोगा जी के वंशज थे।
    • वैर का किला - इस किले का निर्माण भी महाराजा बदन सिंह ने करवाया था। इसके चारों तरफ प्रताप नहर है।
    • डीग का किला - इस किले का निर्माण महाराजा बदन सिंह ने 1730 में करवाया था। डीग को 'जलमहलों की नगरी' भी कहा जाता है। डीग के जलमहल फव्वारों के लिए विख्यात है।
    • त्रिभुवनगढ़/तवनगढ़ दुर्ग - इसका निर्माण बयाना में त्रिभुवनपाल ने करवाया था। इस दुर्ग में ननंद-भोजाई का कुआं है।
    • सोजत दुर्ग - सोजत किले का निर्माण 1460 के आसपास राव जोधा के पुत्र नीम्बा ने सुकड़ी नदी के मुहाने पर नानी सिरड़ी नामक डूंगरी पर करवाया था।
    • किलोनगढ़ दुर्ग - बाड़मेर दुर्ग के नाम से प्रसिद्ध किलोनगढ़ दुर्ग का निर्माण 1552 ईस्वी में राव भीमोजी ने करवाया था।
    • नीलकंठ दुर्ग - राजोरगढ़ दुर्ग के नाम से प्रसिद्ध नीलकंठ दुर्ग अलवर जिले के टहला कस्बे के पास आरावली पर्वतमाला की पहाड़ी पर स्थित है।
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