राजस्थान के प्रमुख मंदिर/शीर्ष मंदिर : आज की इस पोस्ट में जिलेवार राजस्थान के प्रमुख मंदिर दिए गए है। इसमें राजस्थान के 33 जिलों के प्रमुख मंदिर दिए गए है। इसमें राजस्थान के प्रमुख जैन मंदिर, मारवाड़ के प्रमुख मंदिर, राजस्थान के प्रमुख मंदिरों की ट्रिक, राजस्थान के प्रमुख मंदिरों के नाम बताइए Trick PDF Download आदि शामिल किये गए है।
राजस्थान के प्रमुख मंदिर/जिलेवार शीर्ष मंदिर - Major Temples of Rajasthan List in Hindi
राजस्थान के प्रमुख मंदिर

राजस्थान  प्रमुख मंदिर

अजमेर जिले के प्रमुख मंदिर - 

  • सोनीजी की नसीयां - यह जैन सम्प्रदाय का प्रसिद्ध मंदिर है। इसे लाल मंदिर भी कहते है। यह शहर के मध्य पर्यटकों को आकर्षित करती ऊँचे शिखर एवं मान स्तम्भ वाली लाल पत्थर की ईमारत प्रथम जैन तीर्थंकर ऋषभदेव/आदीनाथ का मंदिर है। स्वर्गीय सेठ मूलचन्द सोनी द्वारा इसका निर्माण कार्य 1864 में प्रारम्भ किया गया तथा उनके पुत्र स्वर्गीय सेठ टीकमचन्द सोनी द्वारा 1865 ई. में निर्माण कार्य पूरा करवाया गया।
  • बह्मा मन्दिर (पुष्कर) - पुष्कर (अजमेर) में स्थित विश्व का प्रसिद्ध ब्रह्मा मंदिर। यह 14वीं शताब्दी में निर्मित्त विश्व प्रसिद्ध ब्रह्मा का एकमात्र मंदिर है, जहाँ विधिवत् पूजा अर्चना की जाती है। इस मन्दिर के परिसर में पंचमुखी महादेव, लक्ष्मीनारायण, गौरीशंकर, पातालेश्वर महादेव, नारद और नवग्रह के छोटे-छोटे मन्दिर बने हुए हैं।
  • सावित्री मन्दिर (पुष्कर ) - पुष्कर के दक्षिण में रत्नागिरी पर्वत पर ब्रह्माजी की पत्नी सावित्री का मंदिर स्थित है। यहाँ भादवा शुक्ला सप्तमी को मेला भरता है। यहीं पर देवी सावित्री की पुत्री सरस्वती माँ की प्रतिमा भी है। ऐसा माना जाता है कि यज्ञ के समय सावित्री माता अपने पति ब्रह्मा से रुठकर यहां चली आयी थीं। यहीं सावित्री माता ने ब्रह्माजी को श्राप दिया था कि उनकी पूजा पुष्कर के अतिरिक्त कहीं नहीं होगी।
  • आनंदी माता का मंदिर (नीसल, किशनगढ़) - यह मंदिर 9 वीं सदी में बना सूर्य मंदिर था। जिसे बाद में आनंदी माता का मंदिर कर दिया गया। यह मंदिर पंचायतन शैली में बना है।
  • काचरिया मंदिर -  किशनगढ़ (अजमेर) में स्थित इस मंदिर में राधाकृष्ण का स्वरूप विराजमान है। इस मंदिर में भगवान कृष्ण की मूर्ति अष्ट धातु की तथा राधा की मूर्ति पीतल की है। मंदिर में भगवान की सेवा निम्बार्क पद्धति से की जाती है। होली के दूसरे दिन यहाँ डोलोत्सव मनाया जाता है।
  • गायत्री मंदिर - पुष्कर के उत्तर में एक पहाड़ी पर प्रसिद्ध गायत्री मंदिर बना हुआ है।
  • रंगनाथ जी का मंदिर - पुष्कर में द्रविड़ शैली में निर्मित्त भव्य मंदिर जो मूलतः एक विष्णु मंदिर है।
  • वराह मंदिर, पुष्कर - चौहान शासक अर्णोराज द्वारा 12वीं सदी में निर्मित्त यह मंदिर विष्णु के वराह अवतार का मंदिर है ।
  • अजमेर के अन्य शीर्ष मंदिर : पीपलाज माता का मंदिर-ब्यावर, बलाड़ का जैन मंदिर-ब्यावर, आनंडी माता का मंदिर-नोसल (किशनगढ़), नौग्रहों का मंदिर-किशनगढ़, कल्पवृक्ष मंदिर-मांगलियावास (ब्यावर), रघुनाथजी का मंदिर-अजमेर, बंजरगढ़-अजमेर, पुष्कर के मंदिर- ब्रह्माजी मंदिर व उसके परिसर में पातालेश्वर महादेव मंदिर, नर्बदेश्वर मंदिर, लक्ष्मीनारायण, गौरी शंकर मंदिर, सप्तऋषि मंदिर, नवग्रह मंदिर, सावित्री मंदिर- रत्नगिरि पर्वत, सूर्यनारायण मंदिर, दत्तात्रेय मंदिर, रंगनाथजी मंदिर, वराह मंदिर, रमा बैकुंठ मंदिर, आत्मेश्वर महादेव मंदिर, श्राप विमोचनी माता मंदिर, तुलसीदास मंदिर, गायत्री मंदिर।

अलवर जिले के प्रमुख मंदिर -

  • नौगांवा के जैन मंदिर - अलवर जिले में अलवर-दिल्ली मार्ग पर स्थित नौगांवा कस्बा समूचे उत्तरी भारत में दिगंबर जैन समाज का प्रमुख केंद्र माना जाता है। यहां के जैन मंदिरों में तीर्थंकर श्री मल्लिनाथ जी का 9 चौकिया मंदिर बहुत ही प्राचीन है, इसका निर्माण संवत 803 में करवाया गया था। इस जैन मंदिर में विराजमान मल्लीनाथ की प्रतिमा की एक खास विशेषता है, कि इस पर आगे के निचले हिस्से पर कुछ अंकित होने की बजाय इसकी पीठ पर प्रशस्ति अंकित है। जैन तीर्थकर शांतिनाथ भगवान का विशाल मंदिर जिसे ऊपर वाला मंदिर के नाम से भी जाना जाता है, यहीं पर स्थित है।
  • तिजारा जैन मंदिर, तिजारा - अलवर के तिजारा में स्थित आठवें जैन तीर्थंकर भगवान चंद्रप्रभु का एक विशाल मंदिर है। इस मंदिर में देहरा नामक स्थान पर चंद्रप्रभु भगवान की मूर्ति प्राप्त हुई थी। यहां पर प्रति वर्ष फाल्गुन शुक्ला सप्तमी व श्रावण शुक्ला दशमी को एक विशाल मेला लगता है।
  • नौगजा जैन मंदिर - अलवर के नौगजा नामक स्थान पर विशाल जैन मंदिरों के अवशेष प्राप्त हुए हैं। इनमें भगवान पार्श्वनाथ की 27 फीट ऊंची प्रतिमा भी है। यह स्थान अलवर शहर से 60 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में स्थित है।
  • नारायणी माता का मंदिर - नारायणी माता का यह मंदिर अलवर जिले के राजगढ़ तहसील में बरवा डूंगरी की पहाड़ी की तलहटी ने स्थित है। यह मंदिर सघन वृक्षों से घिरा हुआ है तथा यह सभी संप्रदायों एवं वर्गों का आराध्य स्थल है। इस मंदिर में प्रतिवर्ष वैशाख शुक्ला एकादशी को नारायणी माता का एक विशाल मेला भरता है।
  • विजय मंदिर पैलेस - अलवर जिले में विजय सागर बांध के तट पर महाराजा जयसिंह द्वारा 1918 में निर्मित विजय मंदिर पैलेस पर्यटन की दृष्टि से खास महत्व रखता है।  पर सीताराम का भव्य मंदिर भी स्थित है। इस भव्य महल और ऊंची मीनार का प्रतिबिंब झील के पानी में झिलमिलाता हुआ प्रतीत होता है, तो उस समय वहां का दृश्य बहुत ही मनोहारी दिखाई देता है। झील के निकट बने इस मनोहरी भवन की दीवारें धार्मिक एवं पौराणिक संदर्भों पर आधारित भित्ति चित्रों से अलंकृत है।
  • रावण पार्श्वनाथ मंदिर - यह मंदिर अलवर शहर में स्थित है। यह एक प्रसिद्ध जैन मंदिर है।
  • अलवर के अन्य शीर्ष मंदिर - नलदेश्वर महादेव मंदिर (थानागाजी), प्राचीन हनुमान मंदिर (पांडुपोल), चन्द्रप्रभु जैन मंदिर (तिजारा), भर्तृहरि मंदिर (भर्तृहरि) आदि।

बांसवाड़ा जिले के प्रमुख मंदिर -

  • छींछ बांसवाड़ा का ब्रह्मा मंदिर - बांसवाड़ा के छींछ नामक स्थान पर स्थित ब्रह्माजी के मंदिर में ब्रह्माजी की चतुर्मुखी मूर्ति विराजमान है। इस चतुर्मुखी मूर्ति की स्थापना महारावल जगमाल ने की थी। इस मंदिर का निर्माण 12 वीं सदी में करवाया गया। तथा यहां पर आम्बलिया तालाब की पाल पर छींछ देवी का प्राचीन मंदिर है।
  • घोटिया अंबा - यहां पर अंबा माता धाम के अलावा अन्य केलापानी, पांडवकुंभ और घोटेश्वर महादेव के प्रमुख पवित्र तीर्थ है। ऐसा माना जाता है कि पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान कुछ समय घोटिया अंबा (केलापानी) स्थान पर व्यतीत किया था। यहां पर पांडवों की प्रतिमा लगी हुई है। यहां पर चैत्र अमावस्या को विशाल मेला भरता है। घोटिया अंबा से कुछ ही दूर सुरंग द्वारा जुड़ा हुआ भीमकुंड स्थित है इसे आदिवासियों का दूसरा कुंभ भी कहा जाता है।
  • आर्थुणा का मंदिर - वागड़ के परमार राजाओं द्वारा निर्मित आर्थुणा मंदिर बांसवाड़ा में स्थित है। इसका प्राचीन नाम "उत्थुनक" था। यह स्थान प्राचीन काल में वागड़ के परमार शासकों की राजधानी रहा है।
  • कालिंजरा जैन मंदिर - हिरण नदी के के समीप कालिंजरा गांव में इस कालिंजरा जैन मंदिर में जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव की मूर्ति लगी हुई है।
  • त्रिपुरा सुंदरी मंदिर - राजस्थान की प्रथम महिला मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की आराध्य देवी त्रिपुरा सुंदरी का मंदिर तलवाड़ा के निकट बांसवाड़ा में स्थित है। इसे स्थानीय लोग "तुरताई माता" के मंदिर के नाम से भी जानते हैं। इस मंदिर में काले पत्थर से बनी देवी की अष्टादश भुजा की मूर्ति विराजमान है। प्रतिवर्ष नवरात्र पर यहां पर मेला भरता है। यह पांचालों की कुलदेवी है।
  • घूणी के रणछोड़ रायजी का मंदिर - हर मनोकामना पूर्ण करने वाला व फसलों के रक्षक देव के रूप में पूजा जाने वाला रणछोड़ रायजी का यह मंदिर महाभारतकालीन तीर्थ माना जाता है। यह मंदिर उदयपुर मार्ग पर गनोड़ा के निकट स्थित है। यहां पर प्रतिवर्ष फाल्गुन शुक्ला एकादशी (आंवला एकादशी) को मेला भरता है।

बारां जिले के प्रमुख मंदिर - 

  • ब्रह्माणी माता का मंदिर - राजस्थान का एकमात्र ब्रह्माणी माता का मंदिर जहां देवी की पीठ की पूजा की जाती है, सोरसन (बारां) में स्थित है। इसे शैलाश्रय गुहा मंदिर भी कहते हैं। इस मंदिर में झालावाड़ के शासक झाला जालिमसिंह ने सीढ़ियां बनवाई थी। यह कुम्हारों की कुल देवी है। यहां पर माघ शुक्ल सप्तमी को गधों का मेला लगता है।
  • भण्डदेवरा शिवमंदिर (रामगढ़) - "राजस्थान का मिनी खजुराहो/हाड़ोती का खजुराहो" उपनाम से प्रसिद्ध भण्डदेवरा बारां जिले में स्थित है। भण्डदेवरा का अर्थ : टूटा-फुटा देवालय होता है। इसका निर्माण शत्रुओं पर अपनी विजय के उपलक्ष में मेदवंशीय राजा मलयवर्मन द्वारा किया गया। यह मंदिर पंचायतन शैली का उत्कृष्ट नमूना है। यहां पर मिथुन मुद्रा में बहुत सारी आकृतियां उत्कीर्ण है, इसलिए इसे राजस्थान का मिनी खजुराहो भी कहते है। यहां पहाड़ी पर अन्नपूर्णा देवी का मंदिर भी है।
  • काकुनी मंदिर समूह - 'काकुनी मंदिर समूह' बारां जिले की छिपाबड़ोद तहसील में मुकुंदरा की पहाड़ियों में परवन नदी के किनारे बने हुए हैं।
  • गड़गच्च देवालय, अटरू(बारां) - अटरू का प्राचीन नाम 'अटलपुरी' था, यहां पर बने फूलदेवरा मंदिर को 'मामा-भांजा का मंदिर' भी कहा जाता है।
  • शाही जामा मस्जिद - यह शाहाबाद में स्थित है तथा यह औरंगजेब के समय की बनी हुई है।

बाड़मेर जिले के  प्रमुख मंदिर -

  • किराडू के मंदिर (राजस्थान का खजुराहो) - किराडू की स्थापत्य कला नागर शैली की है। किराडू का प्राचीन नाम किरात कूप था। यह प्राचीन काल में परमार शासकों की राजधानी रही थी। बाड़मेर के हाथमा गांव के निकट एक पहाड़ी के नीचे किराडू में भगवान विष्णु व शिव मंदिर स्थित है। यहां पर प्रसिद्ध सोमेश्वर मंदिर भी स्थित है सोमेश्वर मंदिर किराडू का सबसे प्रमुख एवं बड़ा मंदिर है। किराडू को पुरातत्व, इतिहास, अध्यात्म की त्रिवेणी के नाम से जाना जाता है। यहां पर किराडू के मंदिर के अलावा सोमेश्वर मंदिर, शिव मंदिर, विष्णु मंदिर, रणछोड़ मंदिर, सचिया माता मंदिर स्थित है। किराडू मिथुन मूर्तियों की भव्यता का कारण राजस्थान का खजुराहो कहलाता है।
  • श्री नाकोडा -  मेवानगर के जैन तीर्थ के उपनाम से प्रसिद्ध श्री नाकोडा प्रसिद्ध तीर्थ स्थल बालोतरा के पश्चिम में भाकरियाँ नामक पहाड़ी पर स्थित है। मुख्य मंदिर में 2वे जैन तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिमा विराजित है। प्रतिवर्ष तीर्थकर पार्श्वनाथ  के जन्म दिन पौष कृष्णा दशमी को एक विशाल मेला लगता है।   
  • विरातरा  माता का मंदिर - बाड़मेर के चौहटन तहसील में पहाड़ियों पर विरातरा  माता का एक भव्य मंदिर स्थित है।  विरातरा  माता भोपा जनजाति की कुलदेवी है। यहां पर प्रतिवर्ष माघ एवं भाद्रपद शुक्ला चतुर्दशी को एक विशाल मेला भरता है।
  • ब्रह्मा का मंदिर (आसोतरा) - सिद्ध पुरुष खेताराम जी महाराज द्वारा निर्मित ब्रह्मा का मंदिर आसोतरा (बाड़मेर) में स्थित है।
  • श्री रणछोड़रायजी का खेड़ा मंदिर  - यह हिंदुओं का प्रमुख पवित्र धाम है। यह लूणी नदी के किनारे स्थित है। खेड़ में भूरिया बाबा तथा खोड़िया बाबा रेबारियों/देवासियों के आराध्य देव है। यहां पर खोड़िया हनुमान मंदिर, पंचमुखी महादेव मंदिर आदि स्थित है।
  • मल्लीनाथ मंदिर - मल्लिनाथजी का समाधि स्थल मल्लीनाथजी का मंदिर तिलवाड़ा बाड़मेर में स्थित है।  
  • मां नागणेची का मंदिर - राठौड़ों की कुलदेवी मां नागणेची का मंदिर बाड़मेर के नागाणा गांव में स्थित है। यहां देवी की लकड़ी की प्रतिमा विराजित है।
  • आलमजी का मंदिर - यह मंदिर एक ऊंचे धोरे पर बाड़मेर के धोरीमना क्षेत्र में स्थित है।
  • अन्य मंदिर -  जूना बाड़मेर, शिव मुंडी महादेव मंदिर, जसोल राणी भटियाणी का मंदिर, शिव का गरीबनाथ का मंदिर, पीपलूद का हल्देश्वर महादेव का मंदिर आदि।


भरतपुर जिले के प्रमुख मंदिर -

  • गंगा मंदिर - गंगा मंदिर का निर्माण कार्य भरतपुर रियासत के शासक महाराजा बलवंत सिंह ने 1846 में प्रारंभ करवाया था।  इस मंदिर को बनाने में बंसी पहाड़पुर के लाल पत्थरों का प्रयोग किया गया है। 2 मंजिले गंगा मंदिर की इमारत 84 खंभों पर टिकी हुई है। इसके सामने का हिस्सा मुगल शैली पर तथा पीछे का हिस्सा बौद्ध शैली में निर्मित प्रतीत होता है इसके बाद में महाराजा बलवंत सिंह के वंशज महाराज बृजेंद्र सिंह ने इस इमारत में 12 फरवरी, 1937 को गंगा की सुंदर मूर्ति प्रतिष्ठित करवाई। इस गंगा मंदिर में गंगा मैया के वाहन मगरमच्छ की विशाल मूर्ति भी विराजमान है।
  • उषा मंदिर (बयाना) - कन्नौज के महाराजा महिपाल की रानी चित्रलेखा ने भगवान श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध की पत्नी के नाम पर सन 956 में बयाना में उषा मंदिर का निर्माण करवाया था। जिसे बाद में आक्रमणकारियों (मुस्लिम) ने तुड़वाकर उषा मस्जिद का रूप दे दिया।
  • लक्ष्मण मंदिर - इस मंदिर का निर्माण महाराजा बलदेव सिंह ने प्रारंभ करवाया था तथा इसको महाराजा बलवंत सिंह ने पूरा किया था। यह मंदिर भरतपुर शहर के लगभग बीचोंबीच स्थित है।
  • गोकुलचन्द्र मंदिर, कामां - कामवन एवं काम्यक वन के नाम से पौराणिक ग्रंथों में वर्णित कामां में पुष्टिमार्गीय वैष्णवों के आराध्य गोकुलचन्द्र का प्रसिद्ध मंदिर स्थित है।

भीलवाड़ा जिले के प्रमुख मंदिर -

  • सवाई भोज मंदिर  - सवाई भोज मंदिर आसींद (भीलवाड़ा) में खारी नदी के तट पर स्थित है। यह लगभग ग्यारह सौ वर्ष पुराना मंदिर है। इसे देवनारायण जी का मंदिर भी कहते हैं। गुर्जर जाति के लोग इसे अपना श्रद्धा का केंद्र मानते हैं। इन्हें गुर्जर जाति के लोग विष्णु का अवतार/आयुर्वेद ज्ञाता आदि नामों से पुकारते हैं। यह मंदिर 24 बगड़ावत भाइयों में से एक सवाई भोज को समर्पित है, इसलिए इसे सवाई भोज मंदिर कहते हैं। इस मंदिर में कोई भी मूर्ति विराजमान नहीं है। यहां पर केवल ईंट की पूजा नीम की पत्तियों द्वारा की जाती है। यहां पर भाद्रपद शुक्ला छठ को एक विशाल मेला भरता है। देवनारायण जी की फड़ राजस्थान में बहुत ही लोकप्रिय है। यह राजस्थान की सबसे लंबी, सबसे प्राचीन फड़ है। देवनारायण जी की फड़ पर 1992  में ₹5 का टिकट जारी हुआ था।  देवनारायण जी की फड़ को बांचने के लिए जंतर नामक वाद्य यंत्र को काम में लिया जाता है। 
  • शाहपुरा का रामद्वारा - शाहपुरा में रामस्नेही संप्रदाय का प्रधान मठ स्थित है। रामस्नेही संप्रदाय के संस्थापक श्री रामचरण जी महाराज ने रामस्नेही संप्रदाय की मुख्य गद्दी शाहपुरा में 1751 में स्थापित की थी। प्रतिवर्ष चैत्र कृष्ण प्रतिपदा से पंचमी तक शाहपुरा में फूलडोल महोत्सव बड़ी धूमधाम के साथ मनाया जाता हैं।
  • बाईसा महारानी का मंदिर - यह मंदिर गंगापुर (भीलवाड़ा) में स्थित है। इस मंदिर का निर्माण ग्वालियर के महाराजा महादजी सिंधिया की पत्नी महारानी गंगाबाई की स्मृति में करवाया गया था। महारानी गंगाबाई उदयपुर के महाराणा व उनके उमराव देवगढ़ राव के मध्य सुलह करवाने के लिए उदयपुर गई थी और वहां से वापस लौटते वक्त उनका देहांत हो गया था। यहां पर उनकी छतरी बनी हुई है। इस मंदिर में गंगाबाई की मूर्ति में विराजमान है। 
  • हरणी महादेव का मंदिर -  यहां पर प्रतिवर्ष शिवरात्रि के अवसर पर विशाल मेला लगता है। यहां एक झुकी हुई चट्टान के नीचे शिव जी का मंदिर भी बना हुआ है।
  • तिलस्वा महादेव मंदिर - मांडलगढ़ के निकट स्थित इस मंदिर में शिवरात्रि को एक मेला भरता है। यहां पर एक जलकुंड है, जो चर्म रोग निवारण के लिए प्रसिद्ध है।
  • धनोप माता का मंदिर - यह मंदिर धनोप गांव (भीलवाड़ा) में स्थित है। राजा धुंध की कुलदेवी धनोप माता के इस मंदिर में प्रतिवर्ष चैत्र सुदी एकम से चैत्र सुदी दशमी तक एक विशाल मेला आयोजित होता है।
  • भीलवाड़ा के अन्य शीर्ष मंदिर - कुशाल माता का मंदिर (बदनौर), देवडूंगरी मंदिर (पुर), बिजासन माता का मंदिर (मांडलगढ़), यक्षणी माता का मंदिर (माण्डल), महानालेश्वर मंदिर (मेनाल), हजारेश्वर मंदिर (मेनाल), चावंड माता का मंदिर (हमीरगढ़), नृसिंह मंदिर (हमीरगढ़), जोगणिया माता का मंदिर (ऊपरमाल), चारभुजा नाथ मंदिर (मांडलगढ़) आदि।

बीकानेर जिले के प्रमुख मंदिर -

  • करणी माता का मंदिर, देशनोक -  करणी माता को बीकानेर के राठौड़ राजवंश की कुलदेवी कहा जाता है। करणी माता को चूहों वाली देवी तथा चारणों की कुलदेवी कहा जाता है। करणी माता का यह मंदिर देशनोक बीकानेर में स्थित है, इनका बचपन का नाम रिद्धि बाई था। इस मंदिर में सफेद चूहे पाए जाते हैं, जिन्हें काबा कहा जाता है। करणी माता का मेला चेत्र व आश्विन के नवरात्र में भरता है। करणी माता के मंदिर परिसर में सावन-भादो कड़ाइयाँ स्थित है।इस मंदिर में काबा के दर्शन शुभ माने जाते हैं।
  • भांडासर के जैन मंदिर - भांडासर के जैन मंदिर में जैन धर्म के पांचवे तीर्थकर सुमतिनाथ की प्रतिमा विराजित है। इस भव्य मंदिर का निर्माण भांडाशाह नामक ओसवाल महाजन ने 1468 में करवाना प्रारंभ किया था, जो 1514 में पूर्ण हुआ था। इस मंदिर के प्रथम मंजिल के निर्माण में पानी के स्थान पर घी का प्रयोग किया गया था इसलिए इस मंदिर को घी वाला मंदिर भी कहा जाता है।
  • मुकाम - तालवा, नोखा बीकानेर - यह विश्नोई संप्रदाय का प्रमुख पवित्र तीर्थ स्थान है। यहां पर विश्नोई संप्रदाय के प्रवर्तक जांभोजी का समाधि स्थल है। यहां जांभोजी ने 1526 ईस्वी में समाधि ली थी। जाम्भोजी का वास्तविक नाम - धनराज था। इन्हें विष्णु के अवतार/गूंगा-गहला/पर्यावरण वैज्ञानिक आदि नामों से जाना जाता है।
  • श्री कोलायत जी -  सांख्य दर्शन के प्रतिपादक कपिल मुनि की तपोभूमि श्री कोलायतजी का महत्व गंगा स्नान के बराबर माना जाता है। यहां पर कार्तिक पूर्णिमा को प्रसिद्ध मेला भरता है। यहां पर कपिल मुनि का मंदिर भी स्थित है।
  • बीकानेर के अन्य शीर्ष मंदिर - नागणेची माता का मंदिर (बीकानेर), लक्ष्मीनारायण मंदिर (बीकानेर), घुनीनाथ मंदिर (बीकानेर), भैरव मंदिर (कोडमदेसर), रतन बिहारी मंदिर (बीकानेर), हेरम्ब गणपति (बीकानेर), रसिक बिहारी मंदिर (बीकानेर), कपिल मुनि मंदिर (कोलायत) आदि।

बूंदी जिले के प्रमुख मंदिर -

  • केशवरायजी का मंदिर - केशवरायजी के इस प्रसिद्ध मंदिर का निर्माण बूंदी के राजा शत्रुसाल ने 1601 ईसवी में करवाया था। यहां के अन्य मंदिरों में पंच शिवलिंग, अंजनी माता के मंदिर, हनुमान जी के मंदिर, पांडवों की गुफा आदि है। केशोरायपाटन में सुब्रतनाथ मुन्नी का प्रसिद्ध जैन मंदिर स्थित है।
  • बिजासन माता का मंदिर, इंद्रगढ़  -  बूंदी के इंद्रगढ़ में बिजासन माता का प्रसिद्ध मंदिर स्थित है। इस मंदिर को इंद्रगढ़ माता का मंदिर भी कहा जाता है।
  • बूंदी के अन्य शीर्ष मंदिर - रक्त दन्तिका माता का मंदिर (सतूर), केदारेश्वर महादेव मंदिर (बाणगंगा), खटकड़ महादेव मंदिर (नैनवा), सथूर माता का मंदिर (बूंदी), हुडेश्वर महादेव मंदिर (हिण्डोली), लड़केश्वर महादेव का मंदिर (बूंदी) आदि।

चित्तौड़गढ़ जिले के प्रमुख मंदिर -

  • श्रृंगार चंवरी - शांतिनाथ जैन मंदिर जिसका निर्माण महाराणा कुंभा के कोषाधिपति के पुत्र वेल्का ने चित्तौड़गढ़ किले में करवाया था। यह मंदिर राजपूत व जैन स्थापत्य कला का उत्कृष्ट नमूना है। यहां कुंभा की पुत्री रमाबाई की चवरी बनी हुई है।
  • मीरा मंदिर -   मेवाड़ के राणा सांगा के द्वितीय पुत्र भोज की पत्नी मीराबाई के इस मंदिर में मीरा की प्रतिमा के स्थान पर केवल एक तस्वीर लगी हुई हैं। इसके सामने उनके गुरु संत रैदास की छतरी है। यह मंदिर चित्तौड़गढ़ दुर्ग में इंडो-आर्य शैली में निर्मित है। मीराबाई श्री कृष्ण की परम भक्त थी।
  • समिद्धेश्वर मंदिर - इस मंदिर का निर्माण 11वीं शताब्दी में मालवा के परमार राजा भोज ने करवाया था। यहां प्राप्त शिलालेख के अनुसार इसका जीर्णोद्धार सूत्रधार जेता के निर्देशन में महाराणा मोकल ने 1428 में करवाया था। इसलिए इस मंदिर को मोकल जी का मंदिर भी कहते हैं। यह मंदिर नागर शैली में बना हुआ है।
  • मातृकुंडिया, राशमी (चित्तौड़गढ़) - चित्तौड़गढ़ जिले के राशमी पंचायत समिति क्षेत्र में हरनाथपुरा गांव के पास बहने वाली बनास एवं चंद्रभागा नदी के किनारे यह तीर्थ स्थल स्थित है। इसे मेवाड़ का हरिद्वार/मेवाड़ का प्रयाग भी कहा जाता है। यहां पर जल में अस्थियां प्रवाहित की जाती हैं। यहां पर लक्ष्मण झूला भी स्थित है।
  • सतबीसी जैन मंदिर - चित्तौड़गढ़ दुर्ग के अंदर 11 वीं सदी में बना एक भव्य जैन मंदिर, जिसमें 27 देवरिया (27 छोटे-छोटे मंदिर) होने के कारण इस मंदिर को सतबीस देवरी भी कहते हैं।
  • सांवलिया जी मंदिर, मंडफिया - सांवलिया जी का यह विश्व विख्यात मंदिर चित्तौड़गढ़ के मंडफिया गांव में स्थित है। यहां पर श्री कृष्णजी की काले पत्थर की मूर्ति विराजमान है। भक्त लोग इन्हें सांवलिया सेठ भी कहते हैं।
  • बाडोली के शिव मंदिर -  इस मंदिर का निर्माण परमार राजा हुन ने करवाया था। यह मंदिर चंबल नदी और बामणी नदी के संगम क्षेत्र में राणा प्रताप सागर बांध के पास भैंसरोडगढ़ (चित्तौड़गढ़) में स्थित है। यह 9 मंदिरों का समूह है। इसमें से सबसे प्रमुख मंदिर घोटेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध है। यह मंदिर गुर्जर प्रतिहार कला का उत्कृष्ट नमूना है।
  • तुलजा भवानी मंदिर - तुलजा भवानी माता के इस मंदिर का निर्माण उड़ना राजकुमार पृथ्वीराज के दासी पुत्र बनवीर ने चित्तौड़गढ़ दुर्ग के अंतिम द्वार रामपोल से दक्षिण की ओर करवाया था। इसी मंदिर के पास पुरोहित जी की हवेली भी स्थित है। यह छत्रपति शिवाजी की आराध्य देवी थी।
  • असवारी माता का मंदिर - यहां पर लकवे के मरीजों का इलाज किया जाता है अर्थात ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर में आने से लकवे के मरीजों का इलाज हो जाता है। यहां स्थित दो तिबारियों में से बीमार बच्चे को निकला जाता है। यह मंदिर चित्तौड़गढ़ की भदेसर पंचायत समिति के निकट निकुंभ में स्थित है। इस मंदिर को असवारी माता का मंदिर (आवरी माता का मंदिर) कहा जाता है।
  • चित्तौड़गढ़ का कुंभ, श्याम मंदिर - चित्तौड़गढ़ दुर्ग में कुंभ श्याम मंदिर व कालिका माता मंदिर (गुहिल वंश की इष्ट देवी ) का निर्माण आठवीं सदी में हुआ था। ये मंदिर प्रतिहारकालीन मंदिर है। ये दोनों मंदिर महामारू शैली के हैं। महाराणा कुंभा ने कुंभ श्याम मंदिर का जीर्णोद्धार 15वीं सदी में करवाया था।

चूरू जिले के प्रमुख मंदिर -

  • सालासर बालाजी का मंदिर - इस मंदिर की स्थापना 1754 ईस्वी में महात्मा श्री मोहनदास जी ने की थी।आसोटा गांव में महात्मा श्री मोहनदास जी को हल चलाते समय दाढ़ी-मूंछ युक्त हनुमान जी की मूर्ति मिली फिर उन्होंने सुजानगढ़ तहसील के सालासर गांव में सालासर बालाजी का मंदिर बनवाया था। यहां पर आश्विन एवं चैत्र की पूर्णिमा को प्रतिवर्ष मेला भरता है। यह मंदिर दाढ़ी-मूंछ युक्त हनुमानजी का देश में पहला मंदिर है। इस मंदिर के बीच में जाल का पेड़ हैं, जिस पर भक्त अपनी कामना पूर्ति के लिए नारियल और धजा बांधते हैं।
  • वैंकटेश्वर/तिरुपति बालाजी सुजानगढ़ - इसका निर्माण वेंकटेश्वर फाउंडेशन ट्रस्ट के सोहनलाल जानोदिया ने 1994 में सुजानगढ़ में भगवान वेंकटेश्वर तिरुपति बालाजी के मंदिर का निर्माण करवाया था। यह मंदिर डॉक्टर एम नागराज एवं डॉक्टर वैकटाचार्य वास्तुविद की देखरेख में ग्रेनाइट, इटालियन मार्बल एवं मकराना मार्बल से लगभग 10000 वर्ग फीट क्षेत्र में बनवाया गया था। यह मंदिर लगभग 75 फीट ऊंचा है।
  • शीर्षमेडी, ददरेवा - मुस्लिम लुटेरों (महमूद गजनबी) से युद्ध (गौरक्षार्थ) के दौरान गोगाजी का सिर ददरेवा (चूरू) में गिरा था। लोक देवता गोगाजी का जन्म स्थल ददरेवा (चूरू) में है। गोगानवमी को गोगाजी के भक्तों द्वारा गोगाजी के राखी चढ़ाई जाती है। ददरेवा में गोगाजी की शीर्षमेड़ी/सिद्धमेडी है। गोगाजी को गौरक्षक देवता/साँपों का देवता/नागराज (हिंदू)/गोगापीर (मुस्लिम)/जाहरपीर(महमूद गजनबी द्वारा) आदि नामों से पुकारा जाता है। गोगाजी के पिता - जेवर, माता - बाछल, पत्नी - केमलदे/रानी धीमल, गुरु - गोरखनाथ, पुत्र- केशरियाजी, गोगाजी की सवारी - नीली घोड़ी। गोगाजी की नीली घोड़ी को "गोगा बाप्पा" कहते है। प्रत्येक किसान खेत की जुताई शुरू करते समय हल व हाली के "गोगा राखडी" बांधते है, जिसमें नौ गांठे होती है।

दौसा जिले के प्रमुख मंदिर -

  • हर्षत माता का मंदिर, आभानेरी (दौसा) - आभानेरी के हर्षत माता के मंदिर का निर्माण प्रतिहार शासकों द्वारा आठवीं शताब्दी में करवाया गया था। यह मंदिर वैष्णव संप्रदाय का है। यह मंदिर आठवीं शताब्दी की प्रतिहार कला का एक अनुपम उदाहरण है।
  • झांझीरामपुरा - इसकी स्थापना ठाकुर रामसिंह ने की थी। यहां पर एक ही जलहरी में 121 महादेव (शिवलिंग) है तथा यहाँ निर्मित गोमुख से सर्दियों में गर्म तथा गर्मियों में ठंडा पानी बहता है। यहां पर श्रावण मास में एक विशाल मेला भरता है। यहां काल बाबा का मंदिर भी स्थित है।
  • मेहंदीपुर बालाजी का मंदिर - मेहंदीपुर बालाजी का यह मंदिर दौसा के सिकंदरा से महुआ के बीच पहाड़ी पर स्थित है। इसे "घाटा मेहंदीपुर" भी कहा जाता है क्योंकि यह मंदिर दो पहाड़ियों के बीच की घाटी पर स्थित है। इस मंदिर में मूर्ति पर्वत का ही अंग है। यहां पर प्रतिवर्ष होली, दशहरा तथा हनुमान जयंती के अवसर पर मेला भरता है। यह मंदिर बुरी आत्माओं, भूत-प्रेत तथा जादू-टोने के निदान हेतु प्रसिद्ध है।
  • दौसा के अन्य शीर्ष मंदिर - लक्ष्मण मंदिर (सिकंदरा), कटारमल भैरव मंदिर (सिकंदरा), गोपालजी का मंदिर (सिकंदरा), गिर्राजजी मंदिर (दौसा), नाथ सम्प्रदाय का गुरुद्वारा (हींगवा), नीलकंठ महादेव मंदिर (दौसा) आदि।

धौलपुर जिले के प्रमुख मंदिर -

  • मचकुंड धौलपुर - 'तीर्थों का भांजा' के उपनाम से प्रसिद्ध मंचकुंड हिंदुओं का एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है। जिस प्रकार तीर्थराज पुष्कर { अजमेर - अजमेर जिले की सम्पूर्ण जानकारी यहां से देखें} को तीर्थ स्थलों का मामा का जाता है, उसी प्रकार धौलपुर जिले के मंचकुंड को तीर्थों का भांजा कहा जाता है। यह तीर्थ स्थल गंधमादन पर्वत पर स्थित है। ऐसा माना जाता है कि मंचकुंड में स्नान करने से चर्म रोग दूर हो जाते हैं। यहां पर प्रतिवर्ष भादव सुदी छठ को मेला भरता है।
  • राधा बिहारी मंदिर - धौलपुर पैलेस के पास स्थित इस मंदिर की बारीक नक्काशी धौलपुर के लाल पत्थर (धौलपुर स्टोन) से ताजमहल की तरह की गई है। यह मंदिर पर्यटन की दृष्टि से बहुत ही आकर्षक है।
  • महाकालेश्वर मंदिर - यह मंदिर धौलपुर के सरमथुरा कस्बे में स्थित है। इस मंदिर में भाद्रपद शुक्ला सप्तमी से चतुर्दशी तक मेला भरता है। इस कस्बे की स्थापना 1327 ईस्वी में पालवंश के शासक अर्जुन देव ने की थी।
  • सैपऊ महादेव मंदिर, सैपऊ (धौलपुर) - सैपऊ कस्बे के निकट पार्वती नदी के किनारे स्थित इस मंदिर में चमत्कारी विशाल शिवलिंग स्थित है।

डूंगरपुर जिले के प्रमुख मंदिर -

  • संत मावजी का मंदिर, साबला - संत मावजी को विष्णु का कल्कि (निष्कलंकी) अवतार माना जाता है। साबला ग्राम में संत मावजी का मुख्य हरि मंदिर स्थित है। यह मंदिर बेणेश्वर धाम से कुछ दूरी पर स्थित है। संत मावजी ने भील समाज के लिए धार्मिक सुधार एवं सामाजिक सुधार हेतु आंदोलन चलाया था। संत मावजी  स्वयं श्री कृष्ण के परम भक्त थे। स्वयं कृष्ण का रूप धारण कर रासलीलाएं करते थे। इन्होंने बेणेश्वर धाम की स्थापना की थी। संत मावजी द्वारा वागडी भाषा में लिखे गए उपदेश "चोपड़ा" कहलाते हैं। उनमें उन्होंने भविष्यवाणियां का वर्णन किया है। उनकी यह भविष्यवाणियां वर्तमान में अक्षरश: सत्य सिद्ध हो रही है। संत मावजी ने निष्कलंक संप्रदाय की स्थापना की थी। जिसकी प्रधान पीठ साबला में माही नदी के किनारे स्थित है। संत मावजी की प्रमुख भविष्यवाणियां - जाति प्रथा के बंधन समाप्त होने, मुद्रा अवमूल्यन, राजतंत्र एवं जागीरदारी प्रथा की समाप्ति, धातु मुद्रा के स्थान पर कागज की प्रतीक मुद्रा के प्रचलन, उत्तर से प्रलयंकारी शक्ति का आगमन, ब्राह्मणों का एकाधिकार समाप्त होने, पश्चिम से शांति स्थापित करने वाली शक्ति का अवतरण तथा भयंकर युद्ध एवं नरसंहार होने आदि थी।
  • देव सोमनाथ मंदिर - सफेद पत्थरों से निर्मित देव सोमनाथ का यह मंदिर डूंगरपुर जिले में स्थित है। यह मंदिर बिना सीमेंट, चुने के विशिष्ट शिल्प विधि से पत्थरों को जोड़कर निर्मित किया गया है। इस मंदिर के आकर्षक झरोखे, कलात्मक शिखर और विशाल आकार वाला यह मंदिर राज्य के अन्य जगहों के श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है।
  • विजय राजेश्वर मंदिर - इस मंदिर का निर्माण महारावल विजय सिंह ने प्रारंभ करवाया था तथा इसे उनके पुत्र महारावल लक्ष्मण सिंह ने पूर्ण करवाया था। यह मंदिर डूंगरपुर के गैप सागर पर पारेवा प्रस्तर से चतुर्भुज आकार में निर्मित है। माही नदी के तट पर स्थित है।
  • गवरी बाई का मंदिर - वागड़ की मीरा कही जाने वाली गवरी बाई का मंदिर डूंगरपुर में महारावल शिव सिंह ने बनवाया था।

जयपुर जिले के प्रमुख मंदिर -

  • शाकंभरी माता का मंदिर - सांभर के चौहानों की कुलदेवी शाकंभरी माता का यह मंदिर सांभर के निकट देवयानी ग्राम के पास स्थित है। यहां पर भाद्रपद शुक्ल 8 को मेला लगता है। यह शाकम्भरी चौहान वंश की पहली राजधानी थी।
  • श्री गोविंद देव जी मंदिर - इस मंदिर का निर्माण जयपुर के संस्थापक सवाई जयसिंह द्वारा सन 1735 में करवाया गया था। यह मंदिर मुख्यत गौड़ीय सम्प्रदाय का है। इस मंदिर में गोविन्द देवजी की प्रतिमा वृन्दावन से लेकर प्रतिस्थापित की गयी है। यह मंदिर जयपुर के सिटी पैलेस के पीछे स्थित जयनिवास बगीचे के बीच स्थित है। गोविन्द देवजी जयपुर के आराध्य देव है। जयपुर के राजा गोविन्द देवजी को अपना शासक एवं स्वयं को उसका दिवान मानते थे। यहां स्थित सतसंग भवन विश्व में बिना खम्भों वाला सबसे बड़ा भवन है। जिसका नाम "गिनीज बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड" में भी दर्ज है।
  • बिड़ला मंदिर (लक्ष्मी-नारायण मंदिर ) - प्रसिद्ध उद्योगपति गंगाप्रसाद बिड़ला के हिंदुस्तान चैरिटेबल ट्रस्ट ने इस मंदिर का  निर्माण करवाया था। इस मंदिर में बी. एम. बिड़ला संग्रहालय स्थित है, जो पर्यटन की दृष्टि से बहुत ही आकर्षक है। यह राजस्थान का एकमात्र मंदिर है जो हिन्दू, मुस्लिम एवं ईसाई डिजाइन से बना है। यह मंदिर एशिया का प्रथम वातानुकूलित मंदिर है।
  • गलता जी तीर्थ, जयपुर -  'जयपुर के बनारस' के नाम से प्रसिद्ध गालव नामक ऋषि का तपस्या स्थल गलताजी तीर्थ एक प्राचीन प्रसिद्ध पवित्र कुंड है। यहां गालव ऋषि का आश्रम था। वर्तमान में इस क्षेत्र में बंदरों की अधिकता के कारण इसे मंकी वैली के नाम से भी जाना जाता है। गलता जी को उत्तर तोताद्रि माना जाता है। यहां पर रामानंदी संप्रदाय की पीठ की स्थापना संत कृष्णदास पयहारी ने की थी। यहां पर मार्गशीर्ष कृष्ण प्रतिपदा को गलता स्नान का विशेष महात्म्य है। पर्वत की सर्वाधिक ऊंचाई पर सूर्य मंदिर गलता जी, जयपुर में है। इसे राजस्थान की मिनी काशी या छोटी काशी भी कहते है।
  • देवयानी, जयपुर - यह  सांभर के समीप देवयानी गांव में एक पौराणिक तीर्थ है। यहां प्रसिद्ध देवयानी कुंड स्थित है। जिसमें वैशाख पूर्णिमा को एक विशाल स्नान पर्व का आयोजन किया जाता है।सांभर (जयपुर) के निकट स्थित देवयानी को सब तीर्थों की नानी कहा जाता है।
  • जगत शिरोमणि मंदिर, आमेर - आमेर के जगत शिरोमणि मंदिर का निर्माण राजा मानसिंह प्रथम की पत्नी कनकावती ने अपने पुत्र जगत की याद में करवाया था। इस मंदिर में भगवन श्री कृष्ण की मूर्ति भी है। इस मंदिर को मीरा मंदिर भी कहते है। ऐसा माना जाता है कि  इस मंदिर के गर्भगृह में वहीं मूर्ति है, जिसकी मीरा आराधना किया करती थी।
  • शीतला माता, चाकसू (जयपुर) - शीतला माता का मंदिर शील की डूंगरी, चाकसू (जयपुर) में स्थित हैं।  शीतला माता का वाहन गधा एवं परम्परागत पुजारी कुम्हार होता है। शीतला माता का प्रतीक चिह्न - मिटटी की कटोरियाँ (दीपक) हैं। शीतलामाता के मंदिर का निर्माण महाराजा श्री माधोसिंह ने करवाया था। शीतला माता के उपनाम - सैढ़ल माता, बच्चों की संरक्षिका, बास्योड़ा, चेचक व बोदरी की देवी, महामाई आदि। शीतला माता राजस्थान की एकमात्र ऐसी देवी है, जिसकी खंडित रूप में पूजा की जाती है।  इनकी पूजा बाँझ स्त्रियां करती है।  शीतला माता का मेला चैत्र कृष्ण अष्टमी (शीतलाष्टमी) को भरता है।  इस अवसर पर खेजड़ी वृक्ष की पूजा की जाती है।
  • जमुवाय माता का मंदिर -  जमुवाय माता को आमेर के कच्छवाहों की कुल देवी कहा  जाता है।  इस मंदिर का निर्माण कछवाहा वंश के संस्थापक दुल्हराय ने करवाया था। जमुवाय माता की मूर्ति के पास गाय एवं बछड़े की प्रतिमा है।
  • गणेश मंदिर -  गणेश मंदिर जयपुर में जवाहरलाल नेहरू मार्ग पर मोती डूंगरी की तलहटी में स्थित है। यहां पर प्रतिवर्ष गणेश चतुर्थी पर एक विशाल मेला भरता है।
  • नकटी माता - नकटी माता का मूल नाम - दुर्गा माता। इनका मंदिर जयपुर में अजमेर रोड पर जयभवानीपुरा में स्थित है। दुर्गा माता का प्रतीक चिन्ह त्रिशूल एवं तलवार है।  नकटी माता की प्रतिमा की नाक चोरो ने काट ली थी इसलिए यह  नकटी माता कहलाती है।
  • कल्कि मंदिर -  कल्कि मंदिर का निर्माण ईश्वरीसिंह ने करवाया था। इस मंदिर में संगमरमर से बना घोडा है जिसके खुर के नीचे एक गड्डा है।
  • ज्वाला माता  - ज्वाला माता को जोबनेर, खंगारोत राजपूतों की कुलदेवी कहा जाता है।  नवरात्रों में इनके मंदिर में मेला लगता है।
  • आमेर की शिलामाता का मंदिर -  शिलामाता का मंदिर आमेर, जयपुर में स्थित है।  शिलामाता कच्छवाहा राजवंश की आराध्य देवी है। शिलामाता के इस मंदिर में विराजमान मूर्ति पाल शैली में काले संगमरमर में निर्मित है। शिलामाता की इस मूर्ति को जयपुर के महाराजा मानसिंह प्रथम 1604 ईस्वी में जस्सोर (वर्तमान बांग्लादेश में ) नामक स्थान से बंगाल के राजा केदार को हराकर लाए थे। शिला माता के मंदिर में मेला चैत्र एवं अश्विन के नवरात्रों में लगता है। शिला माता के ढाई प्याला शराब चढ़ती है।
  • सिद्धेश्वर शिव मंदिर -  यह मंदिर केवल शिवरात्रि के दिन ही आप जनता के लिए खुलता है। इस मंदिर का निर्माण रामसिंह द्वारा 1864 ईस्वी में करवाया गया था। यह मंदिर जयपुर के राजाओं का अपना निजी मंदिर था।
  • खलकाणी माता का मंदिर -  जयपुर के निकट लुनियावासल गांव में खलकाणी माता का प्रसिद्ध मंदिर स्थित है।
  • जयपुर के अन्य मंदिर -  मंदिर श्री माताजी मावलियान, चूलगिरि के जैन मंदिर, पद्मप्रभु मंदिर (पदमपुरा-बाड़ा), महामाई माता का मंदिर ( रेनवाल की लोकदेवी), बृहस्पति देव का  मंदिर, ताड़केश्वर शिव का मंदिर आदि। 

जैसलमेर जिले के प्रमुख मंदिर -

  • रामदेवरा मंदिर - यह मंदिर जैसलमेर जिले की पोकरण तहसील के निकट रुणेचा (रामदेवरा) में स्थित है। इस मंदिर के प्रति लोगों में इतनी श्रद्धा है कि लोग जाति एवं धर्म के आधार पर भेदभाव ना करते हुए दूर-दराज तक सभी क्षेत्रों से सभी समुदायों के लोग पूजा अर्चना एवं दर्शन करने के लिए इस मंदिर में आते हैं। इसलिए यह मंदिर राष्ट्रीय एकता एवं सांप्रदायिक सद्भाव का मुख्य केंद्र माना जाता है। इस मंदिर के पुजारी तवर जाति के राजपूत होते हैं तथा बाबा रामदेव जी के तीर्थ यात्रियों को जातरू कहा जाता है। रामदेव जी ने रामदेवरा से कुछ ही दूरी पर स्थित पंच पीपली में पांचों पीरों को पर्चा दिया था। रामदेव जी को प्रिय श्वेत तथा नीले घोड़े चढ़ाए जाते हैं। रामदेव जी ने कामङिया पंथ चलाया था। भैरव राक्षस का वध किया था। रामदेवजी को चढ़ाई जाने वाली 5 रंगों की ध्वजा नेजा कहलाती हैं। पुजारी रिखिया कहलाते हैं तथा जागरण को जमा कहा जाता है।
  • लोद्रवा के पार्श्वनाथ मंदिर - यह प्राचीन युगल प्रेमी मूमल व महेंद्रा का प्रणय स्थल है।
  • तनोट माता का मंदिर - तनोट माता की पूजा सीमा सुरक्षा बल के जवान करते हैं। यह राजस्थान का एकमात्र ऐसा मंदिर है, जो सेना के अधीन है। तनोट माता के इस मंदिर के सामने भारत की पाकिस्तान पर 1965 के युद्ध की विजय का स्तंभ लगा हुआ है। उपनाम - भोजासरी, सैनिकों की देवी, रुमाली माता, थार की वैष्णो देवी, देगराय आदि।
  • हिंगलाज माता का मंदिर - गडसीसर (जैसलमेर) में स्थित हिंगलाज माता के इस मंदिर में माता की पूजा राजस्थान का क्षत्रिय व चारण समाज करता है। हिंगलाज माता का मूल मंदिर बलूचिस्तान (पाकिस्तान) में है। ऐसा माना जाता है कि हिंगलाज माता के दर्शन करने एवं पूजा करने से चर्म रोग दूर हो जाते हैं।
  • स्वांगिया माता का मंदिर - इन्हें जैसलमेर के भाटी राजवंश की कुलदेवी कहा जाता है। इन्हें स्वांगिया माता, सांगिया माता अथवा सुग्गा माता आदि नामों से भी पुकारा जाता है।
  • अमर सागर जैन मंदिर - जैसलमेर में अमर सागर तालाब के किनारे 1871 ईस्वी में बना अमर सागर जैन मंदिर एक भव्य जैन मंदिर है। यह मंदिर शिल्प कला की दृष्टि से एक उत्कृष्ट नमूना है।
  • लक्ष्मी नारायण मंदिर - लक्ष्मी नारायण जी के मंदिर का निर्माण महाराजा बेरीसाल ने 1437 ईस्वी में करवाया था। जैसलमेर के शासक स्वयं को लक्ष्मी नारायण जी का दीवान मानते थे तथा उनको अपना शासक मानते थे।

जालौर जिले के प्रमुख मंदिर -

  • सुंधा माता का मंदिर -  सुंधा माता का मंदिर दांत लावास जालौर में स्थित है सुंधा माता के इस मंदिर में चामुंडा माता की प्रतिमा विराजमान है इस मंदिर में राजस्थान का प्रथम रोपवे दिसंबर 2006 में लगा था राजस्थान का पहला बालू अभ्यारण्य जसवंतपुरा क्षेत्र में सुंधा माता मंदिर के निकट ही जालौर में स्थित है। 
  • मां आशापुरा का मंदिर - आशापुरा माता को महोदरी माता के उपनाम से भी जाना जाता है। आशापुरा माता को जालौर के सोनगरा चौहानों की कुलदेवी भी कहा जाता है। आशापुरा माता का यह मंदिर मोदरा रेलवे स्टेशन के निकट स्थित है। जहां पर नवरात्रा में विशाल मेले का आयोजन होता है। इस मंदिर में स्थापित मूर्ति लगभग 1000 वर्ष पुरानी है।
  • आपेश्वर महादेव मंदिर - जालौर में रामसीन नामक स्थान पर स्थित है। आपेश्वर महादेव गुर्जर-प्रतिहार कालीन है। इस मंदिर के पुजारी कश्यप गोत्रीय रावल ब्राह्मण है। इस मंदिर का प्राचीन नाम अपराजितेश्वर शिव मंदिर था। यहां पर राजस्थान का पहला श्वेत स्फटिक (कांच से निर्मित) शिवलिंग है।
  • सिरे मंदिर -  जालौर में कन्यागिरी पर यह स्थान योगीराज जालंधरनाथ जी की तपोभूमि है। जिसके नाम पर जालौर का नाम जालंधर पड़ा था। इनके इस मंदिर का निर्माण जोधपुर के राजा मानसिंह ने करवाया था।
  • फता जी का मंदिर -  जालौर के सांथू में फत्ताजी ने अपने गांव की मान मर्यादा हेतु प्राणों को न्यौछावर किया था। जिस कारण वहां पर भाद्रपद शुक्ल नवमी को फता जी का मेला लगता है। 

झालावाड़ जिले के प्रमुख मंदिर -

  • शीतलेश्वर (चंद्रमौलेश्वर) महादेव मंदिर - यह मंदिर झालावाड़ में चंद्रभागा नदी के तट पर स्थित है। इसका निर्माण राजा दुर्गगण के सामंत वाप्पक ने 689 ईसवी में करवाया था। इस मंदिर में लकुलीश की काले पत्थर की सुंदर एवं आकर्षक प्रतिमा बनी हुई है। इस मंदिर में सबसे आकर्षक चीज कीचक है। यह सभामंडप के स्तंभों के ऊपर विशाल पट्टिकाओं को जोड़ने के काम आते हैं। यह  गुप्तकालीन मंदिर है। यह एक अर्धनारीश्वर मंदिर हैं अर्थात आधा शिव  तथा आधा पार्वती।
  • पद्मनाथ मंदिर (झालरापाटन का वैष्णव मंदिर) - इस मंदिर को सात सहेलियों का मंदिर तथा घंटियों का मंदिर भी कहा जाता है। कर्नल जेम्स टॉड ने इस मंदिर को चारभुजा का मंदिर भी कहा है। यह मंदिर कच्छपघात  शैली का है।
  • चांदखेड़ी का जैन मंदिर - यह मंदिर भी झालावाड़ के खानपुर में स्थित है। इस मंदिर में आदिनाथ की विशाल प्रतिमा विराजमान है। यह मंदिर भूगर्भ में बना हुआ है।
  • झालरापाटन का शांतिनाथ जैन मंदिर - यह मंदिर भी कच्छपघात  शैली का बना हुआ हैं। इस मंदिर के गर्भगृह में काले रंग के पत्थर की आदमकदीय  शांतिनाथ दिगंबर जैन प्रतिमा है।
  • चंद्रभागा मंदिर -  यह मंदिर चंद्रभागा नदी के तट पर स्थित है। इसमें कार्तिक पूर्णिमा को विशाल मेला भरता है।
  • आदिनाथ दिगंबर का जैन मंदिर - यह मंदिर झालावाड़ के चांदखेड़ी क्षेत्र में स्थित है। इस मंदिर में भगवान आदिनाथ की पद्मासन प्रतिमा स्थापित है।
  • द्वारकाधीश मंदिर - इस मंदिर का निर्माण जालिम सिंह द्वारा गोमती सागर तालाब के निकट करवाया गया था।
  • सूर्य मंदिर (झालरापाटन) - यह राजस्थान का सबसे प्राचीन सूर्य मंदिर है। इस मंदिर में सूर्य भगवान के घुटने तक जूते पहने हुए की प्रतिमा स्थापित है।
  • नागेश्वर पार्श्वनाथ - यह मंदिर भी झालावाड़ में चोमहला  में स्थित है। 

झुंझुनूं जिले के प्रमुख मंदिर -

  • रानी सती का मंदिर -  रानी सती अग्रवाल जाति की थी। जिनका वास्तविक नाम नारायणी था। इनका प्रसिद्ध मंदिर झुंझुनू में स्थित है। यह मंदिर विश्व का सबसे बड़ा सती मंदिर है। रानी सती का उपनाम - चावों की देवी, शक्तिपीठ, दादीजी आदि। रानी सती अग्रवालों की कुलदेवी है। इनके मंदिर में भाद्रपद अमावस्या को प्रसिद्ध मेला भरता है।
  • खेतड़ी महल, झुंझुनू -  इस महल का निर्माण खेतड़ी के महाराजा भोपाल सिंह द्वारा अपने ग्रीष्मकालीन विश्राम हेतु अनेक खिड़कियों एवं झरोखों से सुसज्जित कर बहुमंजिला इमारत के रूप में करवाया था। खेतड़ी महल में जयपुर के हवामहल एवं लखनऊ जैसे भूल-भुलैया की झलक देखने को मिलती है।
  • सकराय माता का मंदिर (उदयपुरवाटी, झुंझुनू) -  सकराय माता खण्डेलवालों की कुलदेवी है। सकराई माता ने अकाल के समय अकाल पीड़ितों के लिए फल, सब्जियां, कंदमूल उगाये थे। जिसके कारण यह शाकंभरी कहलाई। इस माता को सबसे पहले इंटरनेट पर जारी किया था। नवरात्रों के अवसर पर यहां माता का मेला लगता है। सकराई माता का पुजारी नाथ संप्रदाय का व्यक्ति होता है।
  • रघुनाथ चुंडावत जी का मंदिर -  यह मंदिर खेतड़ी (झुंझुनू) में स्थित है। इस मंदिर का निर्माण बख्तावर की पत्नी चुंडावत ने करवाया था। यह मंदिर विश्व का एकमात्र ऐसा मंदिर है, जिसमें राम एवं लक्ष्मण की दाढ़ी-मूछ वाली प्रतिमा स्थापित है।

जोधपुर जिले के प्रमुख मंदिर -

  • सच्चियाँ माता का मंदिर, ओसियां - ओसिया (जोधपुर) में स्थित सच्चियाँ माता के इस मंदिर में माता की पूजा हिंदुओं और ओसवालों  द्वारा समान रूप से की जाती है। सचियां माता का मंदिर महिषमर्दिनी की सजीव प्रतिमा के लिए प्रसिद्ध है।
  • महामंदिर, जोधपुर - जोधपुर का यह महामंदिर नाथ सम्प्रदाय का एक प्रमुख तीर्थ स्थल है। इसका निर्माण 1812 ईसवी में जोधपुर नरेश महाराजा मानसिंह द्वारा करवाया गया था। यह मंदिर 84 खंभों पर निर्मित है। इसलिए यह पर्यटन की दृष्टि से बहुत ही आकर्षक मंदिर है।
  • अधरशिला रामदेव मंदिर - यह मंदिर जालोरिया का बास, जोधपुर में एक सीधी चट्टान पर स्थित है। यह मंदिर बाबा रामदेव का मंदिर है।
  • संबोधीधाम, जोधपुर - कायलाना झील के पास जोधपुर में स्थित इस धाम का निर्माण जैन धर्मावलंबियों द्वारा करवाया गया था।
  • जोधपुर के अन्य शीर्ष मंदिर - चामुंडा देवी का मंदिर (मेहरानगढ़), बाणगंगा मंदिर (बिलाड़ा), मुरली मनोहर मंदिर (मेहरानगढ़), गंगश्याम मंदिर (जोधपुर), लटियालजी का जैन मंदिर (कापरड़ा), आईमाता (बिलाड़ा), महामंदिर (जोधपुर) आदि।

करौली जिले के प्रमुख मंदिर -

  • केला देवी मंदिर - केला देवी का यह मंदिर करौली में त्रिकूट पर्वत की घाटी में कालीसिल  नदी के किनारे स्थित है। इसका निर्माण गोपालसिंह द्वारा 19वीं शताब्दी में करवाया गया था। केला देवी करौली के यदुवंशी राजवंश की कुलदेवी थी। कैला देवी के इस मंदिर के सामने बोहरा भक्त की छतरी है। केला देवी की भक्ति में लोक देवता लांगुरिया के लोक गीत गाए जाते हैं। यहां पर कैला देवी का प्रसिद्ध लक्खी मेला चैत्र शुक्ल अष्टमी को भरता है।
  • श्री महावीर जी का मंदिर - यह मंदिर भी करौली में स्थित है। इस मंदिर में सभी धर्म, सम्प्रदाय के लोग सद्भाव से इस महान तीर्थ की यात्रा करते है। यह मंदिर करौली के लाल पत्थर और संगमरमर के योग से चतुष्कोण आकार में निर्मित है।
  • मदन मोहनजी का मंदिर -  मदनमोहनजी की मूर्ति ब्रजभूमि वृन्दावन से मुस्लिम आक्रांताओं से बचाकर लाई गयी थी।  1748 ईस्वी में इस मंदिर का निर्माण करवाया गया था।
  • अंजनी माता का मंदिर - यहां पर अंजनी माता की श्री हनुमान जी को स्तनपान कराती हुई भारत की एकमात्र मूर्ति है।

कोटा जिले के प्रमुख मंदिर -

  • विभीषण मंदिर, कैथून (कोटा) - यह भारत का एकमात्र विभीषण मंदिर है।
  • कंसुआ का शिव मंदिर - ऐसा माना जाता है कि कण्व ऋषि का आश्रम यही हुआ करता था। यह मंदिर आठवीं शताब्दी में निर्मित है। यहां पर सहस्त्र शिवलिंग है। यह मंदिर गुप्तोत्तरकालीन निर्मित है।
  • मुकंदरा का शिव मंदिर - यह राजस्थान का गुप्तकालीन शिव मंदिर है।
  • भीम चौरी मंदिर - यह दर्रा मुकुंदरा के बीच स्थित गुप्तकालीन शिव मंदिर है। इस मंदिर को भीम का मंडप माना जाता है।
  • चारचौमा का शिवालय - यह शिवालय कोटा के चारचौमा  गांव में स्थित गुप्तकालीन शिव मंदिर है।
  • बूढ़ादीत का सूर्य मंदिर - पंचायतन शैली में निर्मित यह सूर्य मंदिर दीगोद (कोटा) में स्थित है।
  • गेपरनाथ शिवालय - कोटा में कोटा-रावतभाटा मार्ग पर स्थित यह मंदिर गुप्तकालीन मंदिर है।
  • मथुराधीश मंदिर - पाटनपोल के निकट कोटा में स्थित मथुराधीश का यह मंदिर वल्लभाचार्य संप्रदाय के प्रथम महाप्रभु की पीठिका है। इस मंदिर का निर्माण राजा शिवगण ने करवाया था।
  • त्रिकाल चौबीसी मंदिर - कोटा जिले में स्थित इस मंदिर में तीन कालों के 72 तीर्थकरो की प्रतिमाएं विराजमान है।
  • खुटुंबरा शिव मंदिर - यह एक प्राचीन शिव मंदिर है, जो उड़ीसा के मंदिरों के शिखरों से साम्य रखता है। 

नागौर जिले के प्रमुख मंदिर -

  • कैवाय माता का मंदिर - नागौर जिले में परबतसर के पास में किणसरिया गांव में एक पर्वत चोटी पर कैवाय माता का अति प्राचीन मंदिर स्थित है।
  • भांवल माता का मंदिर - यह मंदिर नागौर जिले की मेड़ता तहसील से 20 किलोमीटर दूर स्थित भांवल गांव में स्थित है। यहां पर नवरात्र की अष्टमी को मेला लगता है। इस मंदिर में चामुंडा और महिषमरदिनी के स्वरूपों की पूजा की जाती है। 
  • दधिमती माता का मंदिर - दधिमती माता जिन्हें दाहिमा/दाधीच ब्राह्मणों की आराध्य देवी कहा जाता है। इनका यह मंदिर प्रतिहारकालीन महामारी हिंदू मंदिर शैली का बना है। यह मंदिर नागौर जिले के जायल तहसील में गोठ और मांगलोद नामक गांव की सीमा पर स्थित है।
  • बंशीवाले का मंदिर - इसे मुरलीधर का मंदिर भी कहा जाता है। यह मंदिर नागौर जिले में स्थित है।
  • चारभुजानाथ मंदिर, मेड़ता (नागौर) - इस मंदिर की स्थापना राव दूदा ने की थी। यहां इस मंदिर में संत तुलसीदास जी, मीराबाई, संत रैदास आदि की आदमकद प्रतिमा विराजमान है।

प्रतापगढ़ जिले के प्रमुख मंदिर -

  • भंवरमाता का मंदिर - यह मंदिर प्रतापगढ़ जिले की छोटी सादड़ी तहसील में स्थित है।
  • गोमतेश्वर मंदिर - यह मंदिर प्रतापगढ़ जिले की अरनोद तहसील में स्थित है।
  • सीतामाता का मंदिर - यह सीतामाता अभ्यारण्य में स्थित है।

पाली जिले के प्रमुख मंदिर -

  • चौमुखा जैन मंदिर, रणकपुर - प्रसिद्ध श्वेतांबर जैन मंदिर पाली की देसूरी तहसील में स्थित रणकपुर काचौमुखा जैन मंदिर है। यह मंदिर रणकपुर गांव (पाली) में महाराणा कुंभा के काल में धरणकशाह  द्वारा शिल्पी देपा की देखरेख में 1439 ईस्वी में बनवाया गया था। यह पूरा मंदिर 1444 स्तंभों पर खड़ा है। यह मंदिर माद्री पर्वत की छाया में स्थित है। रणकपुर के इस जैन मंदिर में भगवान आदिनाथ का मंदिर है। इस मंदिर की एक खास विशेषता है कि इसके किसी भी कोने पर खड़े होकर आप भगवान के दर्शन कर सकते हो, इसमें 1444 स्तंभों में से कोई भी स्तंभ आड़े नहीं आता है। इस मंदिर के चारों दिशाओं में भगवान आदिनाथ की प्रतिमाएं स्थापित है, इसीलिए इस मंदिर को 'चतुर्मुख जिन प्रासाद' भी करते हैं 
  • गौतमेश्वर मंन्दिर - गौतमेश्वर का यह मंदिर पाली जिले में सुकड़ी नदी के किनारे स्थित है। गौतमेश्वर को मीणा जनजाति के लोग अपना इष्ट देव मानते हैं और इन्हें प्रेम से भूरिया बाबा के नाम से संबोधित करते हैं। भूरिया बाबा के मेले में मीणा जनजाति के लोग आते हैं तथा वे अपने पूर्वजों की अस्थियां वहां से बहने वाली सुकड़ी नदी में विसर्जित करते हैं। 
  • राता महावीर का जैन मंदिर - यहां पर भी भव्य मंदिर स्थित है जिनकी स्थापत्य कला की तुलना रणकपुर जैन मंदिर से की जाती है।
  • सोमनाथ मंदिर, पाली - पाली में स्थित इस सोमनाथ मंदिर का निर्माण विक्रम सामान 1209 में गुजरात के राजा कुमारपाल सोलंकी ने करवाया था।
  • मूंछाला महावीर मंदिर - इनके मंदिर में मूछों वाले महावीर स्वामी की मूर्ति स्थापित है।
  • सांडेराव का शांतिनाथ जिनालय - यह पाली जिले में स्थित है। इसका निर्माण पांडवों के वंशधर गंधर्वसेन ने करवाया था।

राजसमंद जिले के प्रमुख मंदिर -

  • द्वारिकाधीश मंदिर, कांकरोली - कांकरोली (राजसमंद) में पुष्टिमार्गीय वल्लभ संप्रदाय का सुप्रसिद्ध द्वारिकाधीश मंदिर स्थित है। इस मंदिर में भगवान कृष्ण की प्रतिमा विराजमान है।
  • श्रीनाथजी मंदिर, श्री नाथद्वारा (राजसमंद) - नाथद्वारा वल्लभ संप्रदाय के वैष्णवो का प्रमुख तीर्थ स्थल है। यहां पर श्रीनाथ जी का मंदिर स्थित है। श्रीनाथजी के नाम पर ही इस गांव को श्री नाथद्वारा के नाम से जाना जाने लगा। इस मंदिर में काले मार्बल की प्रतिमा स्थापित है, जो मथुरा से यहां लाई गई थी। यह मंदिर महाराणा राज सिंह के काल में निर्मित है।
  • गड़बोर का चारभुजा नाथ मंदिर - इस मंदिर में चारभुजा नाथ जी की बड़ी पौराणिक चमत्कारी प्रतिमा स्थापित है। यहां पर होली एवं देवझुलनी एकादशी पर मेले भरते हैं। इस मंदिर के पास से होकर गोमती नदी बहती है।
  • घेवर माता का मंदिर - घेवर माता का मंदिर राजसमंद झील की पाल पर स्थित है।
  • चारभुजा देवी का मंदिर - चारभुजा देवी का मंदिर खमनोर (राजसमंद ) में स्थित है। 
  • पिपलाज माता का मंदिर - इस मंदिर का निर्माण गुहिल सम्राट अल्लट  के शासनकाल में हुआ था।

सवाई माधोपुर जिले के प्रमुख मंदिर -

  • गणेश मंदिर, रणथम्भोर - सवाई माधोपुर जिले के रणथम्भोर में स्थित है। गणेश जी के इस मंदिर में गणपति के मात्र मुख वाली प्रतिमा विराजमान है। जिसमे गर्दन, शरीर, हाथ व अन्य अंग नहीं है। इस मंदिर में भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी (गणेश चतुर्थी) को प्रतिवर्ष गणेश मेला भरता है।
  • चमत्कारी जी का मंदिर - सवाई माधोपुर जिले के निकट आलनपुर में चमत्कारी जी का प्रसिद्ध मंदिर स्थित है। इसमें भगवान ऋषभदेव की प्रतिमा विराजमान है। यहां पर प्रतिवर्ष शरद पूर्णिमा को मेला भरता है।
  • घुश्मेश्वर महादेव मंदिर (शिवाड़) - यह मंदिर सवाई माधोपुर जिले के शिवाड़ में स्थित है। इस मंदिर में भगवान शिव का बारहवां  एवं अंतिम ज्योतिर्लिंग अवस्थित है।
  • रामेश्वरम मंदिर - सवाई माधोपुर जिले के खंडार तहसील में चंबल, बनास एवं सीप नदियों के संगम पर प्रसिद्ध रामेश्वर मंदिर स्थित है , जहां पर प्रतिवर्ष कार्तिक पूर्णिमा को मेला भरता है।
  • चौथ माता का मंदिर - चौथ माता कंजर जाति की आराध्य देवी है। जिनका प्रसिद्ध मंदिर चौथ का बरवाड़ा गांव (सवाई माधोपुर) में है। महिलाएं अपने पति की दीर्घायु मांगने के लिए कार्तिक कृष्ण चतुर्थी /करवा चौथ /नवंबर को चौथ माता का व्रत रखती है।
  • धुंधलेश्वर का मंदिर - सवाई माधोपुर जिले के गंगापुर सिटी के पास धुंधलेश्वर का प्राचीन मंदिर स्थित है। यहां पर भाद्रपद कृष्णा नवमी को मेला लगता है। इस मंदिर में भगवान आशुतोष का शिवलिंग स्थित है।
  • हिचकी माता का मंदिर - हिचकी माता का प्रसिद्ध मंदिर सनवाड़ गांव (सवाई माधोपुर) में स्थित है।

सीकर जिले के प्रमुख मंदिर -

  • श्री खाटू श्याम जी मंदिर - यह मंदिर सीकर जिले के दातारागढ़ तहसील के खाटू गांव में स्थित है। खाटू श्याम जी के मंदिर की नींव अभयसिंह जो कि मारवाड़ के राजा अजीतसिंह के पुत्र के द्वारा रखी गई थी। यहां भगवान कृष्ण के स्वरूप श्याम जी का मंदिर है। यहां श्याम जी की शीश की पूजा की जाती है। मुखाकृति दाढ़ी मूंछ से संबंधित है।
  • जीण माता का मंदिर - जीण माता के मंदिर का निर्माण पृथ्वीराज चौहान प्रथम के समय हट्टड़ द्वारा हर्ष की पहाड़ी (रेवासा, सीकर) पर करवाया गया था। जीण माता को चौहानों की कुलदेवी/शेखावटी क्षेत्र की लोक देवी/मधुमक्खियों की देवी के नाम से भी जाना जाता है। जीण माता का जन्म धांधू गांव में हुआ था। जीण माता को ढाई प्याले शराब चढ़ाई जाती है तथा पहले बकरे की बलि दी जाती है। वर्तमान में केवल बकरे के कान चढ़ाए जाते हैं। जीण माता के मंदिर में प्रतिवर्ष चैत्र एवं अश्विन के नवरात्रों में मेला लगता है। सभी देवी-देवताओं में जीण माता का लोकगीत सबसे लंबा है।
  • हर्ष नाथ का मंदिर - इस मंदिर को हर्ष भेरु का मंदिर/हर्ष महादेव का मंदिर भी कहा जाता है। यह मंदिर सीकर जिले में हर्ष गिरी की पहाड़ियों पर स्थित है। इसका निर्माण विग्रहराज द्वितीय के काल में करवाया गया था।
  • सूरनी धाम सूर्य मंदिर - यह मंदिर सीकर जिले के श्रीमाधोपुर तहसील में सुराणा गांव में स्थित है, इस मंदिर में उत्तर भारत की एकमात्र सूर्यपीठ है।
  • भैरू जी का मंदिर - यह मंदिर रींगस (सीकर जिले) में है।
  • ओमल-सोमल मंदिर - यह मंदिर सलेदीपुर (सीकर) में है।
  • झुंझार जी का मंदिर - सीकर जिले के स्यालोदड़ा गांव में झुंझार जी का 5 स्तंभों वाला मंदिर है, जहां पर प्रति वर्ष रामनवमी को मेला लगता है। झुंझार जी का जन्म इमलोहा (नीमकाथाना, सीकर) नामक गांव में हुआ था। जुझार जी का थान प्राय: खेजड़ी वृक्ष के नीचे होता है।

सिरोही जिले के प्रमुख मंदिर -

  • श्री खाटू श्याम जी मंदिर - यह मंदिर सीकर जिले के दातारागढ़ तहसील के खाटू गांव में स्थित है। खाटू श्याम जी केदिलवाड़ा के जैन मंदिर - सिरोही में 11वीं से 13वीं सदी के मध्य सोलंकी कला के अद्भुत जैन मंदिर बने हुए हैं। यह मंदिर नागर शैली में बने हुए हैं। आबू पर्वत पर दिलवाड़ा में 5 श्वेतांबर मंदिर एवं एक दिगंबर जैन मंदिर है, जिनके नाम निम्नानुसार है :- विमलवसहि का जैन मंदिर, लूणवसहि का जैन मंदिर, खारातारा वसहि पार्श्वनाथ जैन मंदिर, महावीर स्वामी मंदिर,  पित्तलहर या भामाशाह का मंदिर।
  • 'रसिया बालम' कुंवारी कन्या का मंदिर - दिलवाड़ा जैन मंदिर के पीछे पर्वत की तलहटी में यह मंदिर स्थित है।
  • भद्रकाली माता का मंदिर - ऋषिकेश मंदिर के रास्ते में यह प्राचीन मंदिर स्थित है।
  • ऋषिकेश मंदिर - यह मंदिर माउंट आबू (सिरोही) में उमरणी गांव में भगवान ऋषिकेश का मंदिर है। यहां पर प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ला एकादशी को मेला भरता है।
  • वशिष्ठजी का मंदिर - यह मंदिर माउन्ट आबू में स्थित है।

टोंक जिले के प्रमुख मंदिर -

  • कल्याण जी का मंदिर, डिग्गी मालपुरा - इस मंदिर का निर्माण मेवाड़ के महाराणा संग्राम सिंह के राज्य काल में हुआ था। यहां श्रद्धालु तारकेश्वर मंदिर (जयपुर) से दंडवत लगाते हुए आते हैं। मुस्लिम इसे कलंह पीर के नाम से पुकारते हैं। डिग्गी के कल्याणजी  को याद करते हुए श्रद्धालु लोकगीत गाते हैं - 'म्हारा डिग्गीपुरी का राजा थारे बाजे छे नोपत बाजा' |  यहां पर भाद्रपद एकादशी एवं वैशाख माह की पूर्णिमा को विशाल मेले लगते हैं।
  • देवनारायण जी का मंदिर - यह मंदिर मासी, बांडी व खारी नदी के संगम पर जोधपुरिया गांव में है।
  • गोकर्णेश्वर महादेव का मंदिर - यह बीसलपुर (टोंक) में स्थित है।
  • जलदेवी का मंदिर - जल देवी का मंदिर टोंक जिले की टोडारायसिंह तहसील के बावड़ी गांव में स्थित है।

उदयपुर जिले के प्रमुख मंदिर -

  • जगत का अंबिका मंदिर - इस मंदिर को मेवाड़ का खजुराहो कहा जाता है।
  • जगदीश मंदिर, उदयपुर - इसकी स्थापना महाराणा जगतसिंह द्वारा 1651 ईस्वी को की गई थी। इसे सपने से बना मंदिर भी कहा जाता है।
  • एकलिंग जी का मंदिर, कैलाशपुरी (उदयपुर) - इस मंदिर का निर्माण मेवाड़ महाराणा बप्पा रावल ने 734 ईसवी में करवाया था। मेवाड़ के महाराणा स्वयं को एकलिंग जी के दीवान मानते थे। यहां पर शिवरात्रि को विशाल मेला लगता है। चैत्र की अमावस्या को प्रतिवर्ष ध्वजा चढ़ाने की रस्म पूरी की जाती है तथा हीरो का नाग चढ़ाया  जाता है।
  • ऋषभदेव मंदिर, उदयपुर - इस मंदिर में देवता को केसर चढ़ती है। इसमें श्वेतांबर-दिगंबर जैन, वैष्णव, भील, शेव एवं तमाम जाति के लोग पूजा करने आते हैं। आदिवासी लोग इन्हें काला जी (काला बावजी ) कहकर पुकारते हैं। भील लोग कालिया बाबा की आण लेते हैं और शपथ लेने के बाद झूठ नहीं बोलते हैं। वैष्णव धर्म के लोग इन्हें विष्णु का अवतार मानकर पूजा करते हैं। चैत्र कृष्ण अष्टमी-नवमी को यहां पर विशाल मेला लगता है।
  • आहड़ (उदयपुर) जैन मंदिर - यह मंदिर उदयपुर में स्थित। यह मंदिर 10 वीं शताब्दी के जैन मंदिरों का एक समूह है। यहां पर आचार्य जगच्चंद्रसूरि को 12 वर्षों के कठोर तप उपरांत तत्कालीन शासक जैत्रसिंह ने 'तपा' विरुद्ध प्रदान किया।
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आज की इस पोस्ट में जिलेवार राजस्थान के प्रमुख मंदिर दिए गए है। इसमें राजस्थान के 33 जिलों के प्रमुख मंदिर दिए गए है। इसमें राजस्थान के प्रमुख जैन मंदिर, मारवाड़ के प्रमुख मंदिर, राजस्थान के प्रमुख मंदिरों की ट्रिक, राजस्थान के प्रमुख मंदिरों के नाम बताइए Trick PDF Download आदि शामिल किये गए है।
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