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राजस्थान की प्राकृतिक वनस्पति, वनों का वर्गीकरण - Vegetation of Rajasthan in Hindi

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राजस्थान की प्राकृतिक वनस्पति : आज की इस पोस्ट में राजस्थान की प्राकृतिक वनस्पति, राजस्थान वन रिपोर्ट के आकड़े, राजस्थान में वनों के प्रकार, राजस्थान के वनो का वनस्पति के आधार पर वर्गीकरण/प्रकार, राजस्थान के वनो का जलवायु के आधार पर वर्गीकरण/प्रकार /भाग, धोकड़ा सागवान का पेड़ पर विस्तृत लेख लिखा गया है। आप सभी इसको पूरा जरूर पढ़ें :- 
राजस्थान की प्राकृतिक वनस्पति, वनों का वर्गीकरण - Vegetation of Rajasthan in Hindi
राजस्थान की प्राकृतिक वनस्पति

राजस्थान में वनस्पति

वन किसे कहते है? -  पौधों की विशेष जाति जिसमें प्राकृतिक वनस्पति (वृक्ष, कटीली झाड़ियां तथा घासे) का आधिक्य हो और अन्य पौधे उनकी छाया में विकसित होते हैं, वन कहलाते है। 
  • 12 मई 1952 की वन नीति के अनुसार कुल क्षेत्र के 33.33 प्रतिशत भू-भाग पर वन होने चाहिए लेकिन राजस्थान में कुल भौगोलिक क्षेत्र के 9.57 प्रतिशत भू भाग पर वन पाए जाते हैं।
  • राजस्थान में स्वतंत्रता के पूर्व सर्वप्रथम जोधपुर रियासत "वन सरंक्षण की योजना" 1910 में लागु की गयी।
  • टोंक रियासत में 1901 में "शिकार एक्ट" बनाया गया।
  • अलवर रियासत में 1935 में "वन अधिनियम" बनाया गया।
  • राजस्थान नवीन वन नीति 2010 में लागु की गयी।
  • वन क्षेत्र की दृष्टि से राजस्थान का देश में 9वां स्थान है।
  • वन क्षेत्रफल की दृष्टि से राजस्थान में सर्वाधिक वन उदयपुर जिले में है और सबसे कम चूरू जिले में है।
  • राजस्थान में वनो का वर्गीकरण दो प्रकार से किया जाता है - 1. प्रशासनिक आधार पर, 2. जलवायु एवं वनस्पति के आधार पर। 

प्रशासनिक दृष्टि से वनो का वर्गीकरण

  • आरक्षित/सुरक्षित वन क्षेत्र - यह राजस्थान में कुल वन क्षेत्र के 38.11% पर स्थित है। ये वन सर्वाधिक उदयपुर जिले में पाए जाते हैं। इन वनों पर राज्य सरकार का अधिकार होता है। इन वनों से लकड़ी काटना, पशु चारण पूरी तरह से वर्जित है। इस प्रकार के वनो में प्रवेश निषेध है। ये वन जलवायु की दृष्टि से राजस्थान में अति महत्वपूर्ण है।
  • रक्षित वन/ संरक्षित वन - यह राज्य की कुल वन क्षेत्र के 55.64% भू-भाग पर फैले है। इस प्रकार के वन सर्वाधिक बारां जिले में हैं। इन प्रकार के वनों पर भी सरकार का नियंत्रण होता है, लेकिन सरकार की आज्ञा के आधार पर सीमित क्षेत्र में लकड़ी काटने, पशु चराने के ठेके दिए जाकर काम किया जाता है। इस प्रकार के वन का क्षेत्रफल राज्य में सर्वाधिक है। 
  • अवर्गीकृत वन - यह वन राज्य के कुल वन क्षेत्र का 6.25% भू-भाग पर स्थित है। इस प्रकार के वन सर्वाधिक बीकानेर जिले में पाए जाते हैं। इन वनों में लकड़ी काटने का प्रतिबंध नहीं है, लेकिन लकड़ी काटने के लिए उन्हें सरकार की अनुमति जरूरी है। इस प्रकार के वन राज्य में सबसे कम क्षेत्रफल में फैले हुए है।

जलवायु एवं वनस्पति के आधार पर वनों का वर्गीकरण

शुष्क सागवान वन -

  • शुष्क सागवान वन राजस्थान में मुख्य रूप से उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा(सर्वाधिक), झालावाड़, बारा, चितौड़ और प्रतापगढ़ जिलों में पाए जाते हैं।
  • शुष्क सागवान वन राजस्थान के  कूल वन क्षेत्र के 6.86 प्रतिशत अर्थात 7% भू-भाग में फैले हुए हैं।
  • शुष्क सागवान वन के क्षेत्र में वार्षिक वर्षा 75 से 110 सेमी तक होती है। 
  • इन वनों की ऊंचाई 10 से 21 मीटर तक मिलती है।
  • शुष्क सागवान वनों में मुख्य रूप से देशी सांगवान के पेड़ पाए जाते है। इसके अलावा यहां पर महुआ, बांस, बरगद आदि के पेड़ मिलते हैं। 
  • प्रतापगढ़ में सागवान के वन सीतामाता अभयारण्य में सर्वाधिक मिलते हैं।

उष्णकटिबंधीय शुष्क वन (मिश्रित पतझड़ी वन) -

  • यह वन मुख्य रूप से दक्षिणी एवं दक्षिणी-पूर्वी अरावली के मध्यम ऊंचाई वाले ढालों के अर्ध शुष्क जलवायु प्रदेश के क्षेत्रों में पाए जाते हैं।
  • यह राज्य के कुल वन क्षेत्र का 28.38% क्षेत्र में है।
  • इस प्रकार के वनों में मुख्य वृक्ष धोकड़ा के पाए जाते है। अन्य वृक्ष आम, खैर, साल, ढाक इत्यादि मिलते हैं।
  • उष्णकटिबंधीय शुष्क वन के क्षेत्र में वार्षिक वर्षा 50 से 80 सेमी तक होती है।

उपोष्ण कटिबंधीय सदाबहार वन -

  • इस प्रकार के वन मुख्य रूप से आबू पर्वत के चारों ओर सिरोही में पाए जाते है।
  • यह वन कुल वन क्षेत्र के 0.39% पर है।
  • इन वनो मे मुख्य रुप से सिरस, बेल, जामुन, बांस, रोहिड़ा वृक्ष पाए जाते है।
  • इस प्रकार के वन क्षेत्र में औसत वार्षिक वर्षा 150 सेमी. या इससे अधिक होती है।
  • यह  क्षेत्र वानस्पतिक विविधता की दृष्टि से राजस्थान का सर्वाधिक सम्पन्न है।

अर्द्धउष्ण कटिबंधीय/शुष्क मरुस्थलीय वन -

  • यह वन राज्य के कुल वन क्षेत्र के 6.26 प्रतिशत क्षेत्र में फैले हुए है।
  • इस क्षेत्र में वार्षिक वर्षा 30 सेमी. से कम होती है।
  • इस प्रकार के क्षेत्र में मुख्यत: मरुदभिद वनस्पति पायी जाती है। वनस्पति के रूप में मुख्यत: खेजड़ी, केर, बबूल, कीकर, बेर आदि पाए जाते है।

अर्द्ध शुष्क उष्णकटिबंधीय धोक वन -

  • यह वन मुख्य रूप से अरावली के पश्चिमवर्ती अर्ध शुष्क जलवायु प्रदेश के क्षेत्रों में पाए जाते हैं।
  • यह राज्य के कुल वन क्षेत्र का 58.11% क्षेत्र में है।
  • इन वनों में मुख्य रूप से कांटेदार वृक्ष पाए जाते हैं।
  • इस प्रकार के वनों में मुख्य वृक्ष धोकड़ा के पाए जाते है। अन्य वृक्ष खेजड़ी पेड़, रोहिड़ा, आक इत्यादि मिलते हैं।
  • उष्णकटिबंधीय शुष्क वन के क्षेत्र में वार्षिक वर्षा 30 से 60 सेमी. तक होती है।

राजस्थान में वन प्रशिक्षण केंद्र

  • मरुवन प्रशिक्षण केंद्र, जोधपुर
  • वानिकी प्रशिक्षण केंद्र, जयपुर
  • राजस्थान वन प्रशिक्षण केंद्र, अलवर

राजस्थान में वन शोध एवं अनुसन्धान केंद्र

  • विश्व वानिकी वृक्ष उद्यान, झालाना (जयपुर)
  • ग्रास फार्म नर्सरी, जयपुर
  • वन अनुसन्धान फार्म, बांकी (सीसारमा, उदयपुर)
  • वन अनुसन्धान फार्म, गोविंदपुरा (जयपुर)

वनस्पति सम्बंधित महत्वपूर्ण जानकारी

  • राजस्थान की कृषि को मानसून का जुआ कहा जाता है।
  • होहोबा - राजस्थान के शुष्क प्रदेशों में इजराइल की सहायता से होहोबा फसल को बोया जाता है।
  • वालरा कृषि - राजस्थान में की जाने वाली विस्थापित/स्थानांतरित कृषि को वालरा कृषि कहते हैं।
  • बर, धामण, मुरात, अंजल, सेवण, करड़ आदि घास के प्रकार है। ये घासें सर्वाधिक जैसलमेर जिले में पाई जाती है।
  • टसर रेशम के उत्पादन से परोक्ष रूप से जुड़े अर्जुन वृक्ष के लिए टसर  विकास कार्यक्रम 1986 में कोटा, उदयपुर तथा बांसवाड़ा जिले में प्रारंभ किया गया।
  • बांस वृक्ष को आदिवासियों का हरा सोना भी कहा जाता है, यह अगरबत्ती एवं स्टिक बनाने में प्रयुक्त होता है।
  • कत्था बनाने के लिए खैर वृक्ष की छाल का प्रयोग किया जाता है।
  • बीड़ी बनाने में प्रयुक्त तेंदू (टिमरू) के पत्तों को प्रयोग किया जाता है। ये पेड़ सर्वाधिक बांसवाड़ा जिले में पाए जाते हैं। तेंदू (टिमरू) को बागड़ का चीकू कहा जाता है।
  • जोधपुर के खेजड़ली गांव में खेजड़ी के पेड़ों को काटने से बचाने के लिए 1730 ईस्वी में अमृता देवी विश्नोई के नेतृत्व में 363 बिश्नोई लोगों ने अपने प्राण न्योछावर किए थे, उन्हें के उपलक्ष में राजस्थान में वन विकास हेतु अमृता देवी पुरस्कार दिया जाता है।
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