राजस्थान के राष्ट्रीय उद्यान एवं वन्य जीव अभ्यारण्य : आज की इस पोस्ट में राजस्थान के राष्ट्रीय उद्यान/अभ्यारण्य/पार्क, राजस्थान के वन्य जीव अभ्यारण्य, राजस्थान के आखेट निषिद्ध क्षेत्र, राजस्थान के कंजर्वेशन रिजर्व, राजस्थान के टाइगर रिजर्व, राजस्थान के जंतुआलय पर एक विस्तृत लेख लिखा गया है। इसमें आप सभी के सवाल राजस्थान के वन्य जीव अभ्यारण्य PDF Download, राजस्थान के राष्ट्रीय उद्यान ट्रिक, राजस्थान में वन्य जीव अभ्यारण्य कितने है उनके नाम, राजस्थान का सबसे छोटा सबसे बड़ा नवीनतम सबसे पुराना वन्य जीव अभ्यारण्य, राजस्थान के वन्य जीव अभ्यारण्य ट्रिक, राजस्थान के जंतुआलय ट्रिक, कंजर्वेशन रिजर्व ट्रिक आदि से सम्बंधित महत्वपूर्ण तथ्य शामिल किये गए है। आप सभी इसको पूरा जरूर पढ़ें:-
राजस्थान के राष्ट्रीय उद्यान, वन्य जीव अभ्यारण्य, जंतुआलय, कंजर्वेशन रिजर्व एवं आखेट निषिद्ध क्षेत्र - Rajasthan GK
राजस्थान के राष्ट्रीय उद्यान

राजस्थान के वन्य जीव के तथ्य

  • रेड डाटा बुक में संकटग्रत व विलुप्त जन्तुओं व वनस्पतियों के नाम प्रविष्ट किये जाते हैं।
  • 23 अप्रैल 1951 को राजस्थान वन्य पक्षी संरक्षण अधिनियम 1951 लागु किया गया।
  • 9 सितम्बर 1972 को भारत सरकार द्वारा वन्य जीव सुरक्षा अधिनियम 1972 लागु किया गया। इसे 1 सितम्बर, 1973 को राजस्थान में लागु किया गया।
  • 42 वां संविधान संशोधन, 1976 के द्वारा वन को राज्य सूची से हटाकर समवर्ती सूची में शामिल किया गया। 
  • रणथम्भौर में टाइगर सफारी पार्क बनाया जायेगा।
  • राजस्थान में कुल 26 वन्य जीव अभ्यारण्य, 33 आखेट निषिद्ध क्षेत्र, 5 जंतुआलय, 3 राष्ट्रीय उद्यान, 7 मृगवन, 11 कंजर्वेशन रिजर्व, 2 रामसर स्थल है।

राजस्थान के राष्ट्रीय उद्यान

रणथम्भौर राष्ट्रीय उद्यान, सवाईमाधोपुर -

  • रणथम्भौर राष्ट्रीय उद्यान देश का सबसे छोटा बाघ अभ्यारण्य है।
  • इस अभ्यारण्य को 1955 में वन्य जीव अभ्यारण्य घोषित किया गया।
  • अप्रैल, 1974 में रणथम्भौर राष्ट्रीय उद्यान को 'टाइगर रिजर्व प्रोजेक्ट' में शामिल किया गया।
  • 1 नवंबर, 1980 में रणथम्भौर राष्ट्रीय उद्यान को राजस्थान का प्रथम राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया।
  • रणथम्भौर राष्ट्रीय उद्यान को 'भारतीय बाघों का घर' कहते है। 
  • राजस्थान में सर्वप्रथम बाघ परियोजना यहीं से शुरू की गयी।
  • इस अभ्यारण्य के प्रबंधन के लिए अलग से "रणथम्भौर बोर्ड" का गठन किया गया।
  • यह अभ्यारण्य दुर्लभ काला गरुड़ एवं रेटेड तीतर के लिए प्रसिद्ध है।
  • यहां पर जोगी महल, त्रिनेत्र गणेश मंदिर दर्शनीय स्थल है।
  • यहां पर तीन झील - मलिक तालाब, पदम तालाब एवं राजबाग झील स्थित है।
  • इस अभ्यारण्य में घूमने के लिए 1960 में एलिजाबेथ, 1985 में राजीव गाँधी, 2000 में बिल क्विंटन तथा वर्ष 2005 में मनमोहन सिंह घूमने आ चुके है।

केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान, भरतपुर -

  • केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान को घना पक्षी विहार अभ्यारण्य भी कहा जाता है।
  • केवलादेव घना पक्षी अभयारण्य का निर्माण किशन सिंह ने स्विजरलैंड की झीलों के आधार पर करवाया था।
  • यह अभयारण्य भारत के प्रमुख पर्यटक परिपथ "सुनहरा त्रिकोण" (दिल्ली, आगरा, जयपुर) एवं राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 11 पर 'राजस्थान के प्रवेश द्वार' भरतपुर में बाणगंगा एवं गंभीरी नदियों के संगम पर स्थित है।
  • इस अभयारण्य को 1956 में पक्षी अभयारण्य घोषित किया गया। 
  • 26 अगस्त 1981 में इसे राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया ( राजस्थान का दूसरा व सबसे छोटा राष्ट्रीय उद्यान) |
  • इस अभयारण्य को 1985 में यूनेस्को की विश्व प्राकृतिक धरोहर की सूची में शामिल किया गया।
  • यह अभयारण्य एशिया की सबसे बड़ी पक्षियों की प्रजनन स्थली है, इसलिए इसे 'पक्षियों का स्वर्ग' (पक्षी अभ्यारण) भी कहते हैं।
  • यह अभ्यारण्य विश्व के शीर्ष 10 अभयारण्य में शामिल है। यहां पर हाल ही में राज्य की प्रथम वन्यजीव प्रयोगशाला स्थापित की जा रही है।
  • यहां पर लाल गर्दन वाले दुर्लभ तोते एवं साइबेरियन सारस पाए जाते हैं। 
  • इस अभयारण्य में ऐंचा घास में फंसकर सर्वाधिक पक्षी मरते हैं।
  • इस अभयारण्य के लगभग मध्य में शिव (केवलादेव) का मंदिर स्थित है इसलिए इसको केवलादेव अभयारण्य के नाम से जाना जाने लगा।

मुकंदरा हिल्स राष्ट्रीय उद्यान -

  • यह अभ्यारण्य कोटा एवं झालावाड़ जिलों में स्थित है।
  • वर्ष 2003 में इस अभयारण्य का नाम दर्रा अभयारण्य से बदलकर राजीव गांधी नेशनल पार्क कर दिया था तथा 2006 में वसुंधरा सरकार ने इसका नाम बदलकर मुकुंदरा हिल्स पार्क रखा तथा इसे राष्ट्रीय उद्यान का स्तर प्रदान करने के लिए प्रस्ताव पारित किया था लेकिन इस प्रस्ताव को केंद्र सरकार ने मंजूरी नहीं दी।
  • इस अभयारण्य में राजस्थान का दूसरा ताजमहल (अबली मीणी का महल) कोटा जिले में स्थित है। इसके अलावा यहां पर गुप्तकालीन हूणों का शिव मंदिर स्थित है।
  • इस अभयारण्य में गागरोनी/हीरामन तोते/हिंदुओं का आकाश लोशन (मनुष्य की आवाज में बोलने वाला), सारस तथा सर्वाधिक घड़ियाल पाए जाते हैं।
  • इस अभयारण्य को राजस्थान का तीसरा राष्ट्रीय उद्यान 9 जनवरी, 2012 को घोषित किया गया तथा राजस्थान का तीसरा टाइगर प्रोजेक्ट अभयारण्य 9 अप्रैल 2013 को घोषित किया गया।
  • इस अभयारण्य के अंतर्गत तीन अभयारण्य आते हैं - दर्रा वन्यजीव अभयारण्य, जसवंत सागर वन्यजीव अभयारण्य, चंबल वन्य जीव अभ्यारण्य। 


राजस्थान के वन्य जीव अभ्यारण्य

राष्ट्रीय मरू उद्यान, बाड़मेर-जैसलमेर -

  • राष्ट्रीय मरू उद्यान बाड़मेर एवं जैसलमेर जिलों में विस्तृत है।
  • राष्ट्रीय मरू उद्यान राजस्थान का क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे बड़ा वन्य जीव अभ्यारण्य है।
  • राष्ट्रीय मरू उद्यान का क्षेत्रफल 3162 वर्ग किलोमीटर है।
  • राष्ट्रीय मरू उद्यान में आकल वुड फॉसिल पार्क(जीवाश्म उद्यान/मरुस्थल पार्क) स्थित है।
  • राष्ट्रीय मरू उद्यान को राज्य पक्षी गोडावण की शरण स्थली भी कहा जाता है।
  • इस अभयारण्य में गोडावण के अलावा काले हिरण, चौसिंगा, मरु बिल्ली, चिंकारा, खरगोश, लोमड़ी, सेंड ग्राउंड, पीवणा सांप आदि मुख्य रूप से पाए जाते हैं।
  • इसमें सेवण घास बहुतायत मात्रा में पायी जाती है।

सरिस्का वन्य जीव अभ्यारण्य, अलवर -

  • सरिस्का वन्य जीव अभ्यारणय की स्थापना 1955 में की गई थी।
  • सरिस्का वन्य जीव अभ्यारण्य को  "बाघों की मांद" नाम से भी जाना जाता है।
  • यह अभ्यारण्य 1978-79 में राज्य की दूसरी बाघ परियोजना के अंतर्गत शामिल हो गया।
  • यह अभ्यारण्य हरे कबूतरों के लिए प्रसिद्ध है। कांकणवाडी का किला भी सरिस्का अभ्यारण में स्थित है।
  • यह अभ्यारण्य 'रीसस बन्दर"  के लिए प्रसिद्ध है।

दर्रा वन्यजीव अभयारण्य -

  • यह अभ्यारण्य कोटा एवं झालावाड़ जिलों में फैला हुआ है।
  • इस अभयारण्य में राजस्थान का दूसरा ताजमहल (अबली मीणी का महल) कोटा जिले में स्थित है।
  • इस अभयारण्य में गागरोनी/हीरामन तोते/हिंदुओं का आकाश लोशन (मनुष्य की आवाज में बोलने वाला), सारस तथा सर्वाधिक घड़ियाल पाए जाते हैं।

कैला देवी वन्य जीव अभ्यारण्य, करौली -

  • यह अभ्यारण्य राजस्थान-मध्यप्रदेश सीमा से लगा हुआ करौली जिले में स्थित है।
  • इस अभ्यारण्य के पश्चिमी किनारे से बनास नदी बहती है तथा दक्षिण-पूर्व दिशा में चम्बल नदी का प्रवाह होता है।
  • इस अभ्यारण्य में चिंकारा, जंगली सूअर, सियार, भेड़िया, हाइना, चीतल, साम्भर, लोमड़ी आदि वन्य जीव पाए जाते है।
  • यहां पर कैला देवी मंदिर के कारण इस अभ्यारण्य का नाम कैला देवी वन्य जीव अभ्यारण्य पड़ा।
  • इस अभ्यारण्य में मुख्यत: धोक वन पाए जाते है।

कुम्भलगढ़ वन्य जीव अभ्यारण्य -

  • यह अभ्यारण्य राजसमंद, उदयपुर तथा पाली जिलों में फैला हुआ है।
  • इस अभ्यारण्य को भेड़ियों की प्रजनन स्थली भी कहा जाता है।
  • यह राजस्थान का एकमात्र अभयारण्य है, जहां से प्रदेश की दो अलग-अलग दिशा में बहने वाली बनास एवं साबरमती नदी का उद्गम होता है।
  • यहां पर जंगली धूसर मुर्गे, कुंभलगढ़ दुर्ग, रणकपुर के मंदिर, परशुराम महादेव मंदिर, चंदन के वृक्ष आदि प्रसिद्ध है।

फुलवारी की नाल अभयारण्य, उदयपुर - 

  • उदयपुर के पश्चिम में 160 किलोमीटर की दूरी पर आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में स्थित इस अभयारण्य की पहाड़ी से मानसी वाकल नदी का उद्गम होता है। यहां से सोम नदी प्रवाहित होती है।
  • इस अभयारण्य में बाघ, बघेरा, चीतल, सांभर आदि वन्य जीव पाए जाते हैं।
  • यहां पर देश का पहला ह्यूमन एनाटॉमी पार्क स्थित है।

रामगढ़ विषधारी वन्य जीव अभयारण्य, बूंदी -

  • रामगढ़ विषधारी वन्य जीव अभयारण्य  सांपों के लिए प्रसिद्ध है।
  • रामगढ़ विषधारी वन्य जीव अभयारण्य को "रणथम्भोर के बाघों का जच्चा घर" एवं "सांपों की शरणस्थली" भी कहते हैं।
  • रामगढ़ विषधारी वन्य जीव अभयारण्य में नीलगाय, बाघ, हिरण, रीछ, बघेरा, जंगली मुर्गे एवं अन्य कई प्रकार के जंगली जीव पाए जाते है।

जमुवारामगढ वन्य जीव अभ्यारण्य, जयपुर -

  • जमुवारामगढ वन्य जीव अभ्यारण्य "जयपुर के पुराने शिकारगाह" के लिए प्रसिद्ध है।
  • इस अभ्यारण्य में मुख्यत: धोक वन पाए जाते है।
  • यह अभ्यारण्य लंगूरों,जगली बिल्ली, भेड़िया, जरक, बघेरा ,नीलगाय आदि के लिए प्रसिद्ध है। इसे 1982 में अभ्यारण्य घोषित किया गया था।

माउंट आबू वन्यजीव अभयारण्य, सिरोही -

  • यह अभ्यारण्य राजस्थान का एकमात्र पहाड़ी पर स्थित अभयारण्य है, जो जंगली भालूओं, मुर्गों, युबलेफरीस (सबसे सुंदर छिपकली) एवं डिकिल पटेरा आबू एंसिस घास (विश्व में एकमात्र यही पाई जाती है) हेतु प्रसिद्ध है।
  • वर्तमान में यह अभयारण्य की गिनती में नहीं आता है। ग्रीन मुनिया नाम की चिड़िया आबू पर्वत पर पाई जाती है।

राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल वन्य जीव अभ्यारण्य -

  • यह अभ्यारण्य राजस्थान के करौली, धौलपुर, सवाई माधोपुर तथा कोटा जिलों में फैला हुआ है।
  • राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल वन्य जीव अभ्यारण्य को घड़ियालो का संसार भी कहा जाता है।
  • यह एकमात्र जलीय अभयारण्य है, जो अन्तर्राज्य अभयारण्य (राजस्थान, मध्यप्रदेश एवं उत्तरप्रदेश में) है।
  • इस अभयारण्य में ऊदबिलाव, शिशुमार एवं गांगेय सूप जैसे स्तनधारी जीव पाए जाते हैं।

नाहरगढ़ जैविक वन्य जीव अभ्यारण्य, जयपुर -

  • नाहरगढ़ जैविक वन्य जीव अभ्यारण्य की स्थापना 22 सितम्बर, 1980 में की गयी थी।
  • इसमें भारत का दुरसा "बायोलॉजिकल पार्क" एवं देश का तीसरा "बियर रेस्क्यू सेण्टर" स्थित है।
  • यह राजस्थान का एकमात्र जैविक पार्क है।
  • यह अभ्यारण्य जंगली सूअर, काला भालू, चीतल, बघेरा, सांभर, चिंकारा, हिरण आदि के लिए प्रसिद्ध है।

जवाहर सागर वन्यजीव अभयारण्य - 

  • यह अभ्यारण्य कोटा, बूंदी एवं चित्तौड़गढ़ जिलों में फैला हुआ है।
  • यह अभ्यारण्य एक जलीय अभयारण्य है।
  • यह अभ्यारण्य उत्तरी भारत का प्रथम सर्प उद्यान है।
  • इस अभयारण्य में सर्वाधिक मगरमच्छ पाए जाते हैं।
  • यह अभ्यारण्य घड़ियालों के लिए प्रसिद्ध है।
  • इस अभ्यारण्य में गेपरनाथ का मंदिर, कोटा बांध, गरड़िया महादेव मंदिर आदि दर्शनीय स्थल है।

शेरगढ़ वन्य जीव अभ्यारण, बारां -

  • शेरगढ़ वन्य जीव अभ्यारण की स्थापना 30 जुलाई 1986 में की गई।
  • यह अभ्यारण सांपों के शरण स्थली के रूप में विख्यात है।
  • परवन नदी इसी अभ्यारण में से होकर गुजरती है।
  • यहां पर मुख्यतः लोमड़ी, बघेरा, सांभर, चीतल आदि मिलते हैं

भैंसरोड़गढ़ वन्य जीव अभयारण्य, चित्तौड़गढ़ -

  • यह अभयारण्य भैंसरोड़गढ़ (चित्तौड़गढ़) के आस पास के वन प्रदेश को मिलकर 05 फरवरी, 1983 को बनाया गया था।
  • यह अभयारण्य रावतभाटा (चित्तौड़गढ़) में राणाप्रताप सागर बांध पर स्थित है।
  • यह अभयारण्य एक लम्बी पट्टी के रूप में चम्बल एवं बामनी नदियों के सहारे-सहारे फैला हुआ है।
  • यह घड़ियालों के लिए प्रसिद्ध है।

बस्सी वन्य जीव अभयारण्य, चित्तौड़गढ़ -

  • इसे 29 अगस्त, 1988 को अभयारण्य घोषित किया गया।
  • यह अभयारण्य जंगली बाघों के विचरण  हेतु विश्व प्रसिद्ध है।
  • इसमें से ओरई एवं ब्राह्मणी/बामनी नदी का उद्गम होता है।

सीतामाता वन्य जीव अभ्यारण्य, प्रतापगढ़ -

  • सर्वाधिक जैव विविधता वाले इस अभयारण्य को चीतल/चौसिंगे (यह एंटीलॉग प्रजाति का दुर्लभ जीव है स्थानीय भाषा में भेंडल कहते हैं) की शरण स्थली/मातृभूमि व उड़न गिलहरियाे का स्वर्ग के नाम से जाना जाता है।
  • इस अभ्यारण्य में सर्वाधिक सागवान के वन  (एक मात्र इसी अभयारण्य में), उड़न गिलहरी (साधारणतया महुआ के पेड़ पर रहती है तथा इसे देखने का अच्छा समय सूर्य के छिपने के बाद हैं। स्थानीय नाम आशोवा है। ), वन औषधियां (हिमालय के बाद सर्वाधिक), पैंगोलिन मिलते हैं।
  • सीतामाता वन्य जीव अभ्यारण्य में सीता माता मंदिर, लव कुश नामक दो जल स्रोत है। यहां से करमोई व जाखम नदी का उद्गम होता है।
  • यह अभ्यारण्य अरावली व विंध्याचल पर्वतमाला तथा मालवा के पठार के संगम स्थल पर है।

बीसलपुर वन्यजीव अभयारण्य, टोंक -

  • यह अभ्यारण्य टोंक जिले की टोडारायसिंह तहसील के राजमहल गांव में स्थित है।
  • यह राजस्थान का नवीनतम अभयारण्य है, इसे वसुंधरा सरकार ने 2006 में अभयारण्य घोषित किया था।

ताल छापर वन्यजीव अभयारण्य, चूरू -

  • इसका प्राचीन नाम द्रोणपुर (वर्तमान सुजानगढ़) था।
  • यह अभ्यारण्य काले हिरण (Black Buck) एवं कुरंजा पक्षी (स्थानीय नाम खिंचन) की शरण स्थली है। 
  • वर्षा ऋतु में इस अभ्यारण्य में  नरम घास "मोथिया'' एवं "मोचिया सायप्रस रोटेन्डस" उगती है।

वन विहार वन्य जीव अभ्यारण्य, धौलपुर -

  • इस अभ्यारण्य की स्थापना 1965 में की गयी।
  • यह अभ्यारण्य हिरण, रीछ, नीलगाय, जरख, भेड़िया और बारहसिंघा आदि वन्य जीवों के लिए प्रसिद्ध है।

रामसागर वन्य जीव अभ्यारण्य, धौलपुर -

  • इस अभ्यारण्य की स्थापना 1955 में की गयी।
  • यह अभ्यारण्य हिरण, रीछ, नीलगाय, जरख, भेड़िया और बारहसिंघा आदि वन्य जीवों के लिए प्रसिद्ध है।

राजस्थान के अन्य प्रमुख वन्य जीव अभ्यारण्य -

  • केसरबाग वन्य जीव अभ्यारण्य - यह अभ्यारण्य  धौलपुर में स्थित है।
  • धौलपुर वन्य जीव अभ्यारण्य - धौलपुर में स्थित है।
  • सवाई माधोसिंह वन्य जीव अभ्यारण्य - यह अभ्यारण्य सवाई माधोपुर जिले में स्थित है।
  • बंध बरेठा वन्यजीव अभयारण्य, भरतपुर - इस अभयारण्य को 'परिंदों का घर' भी कहा जाता है। यह अभ्यारण्य जरखों  के लिए प्रसिद्ध है।
  • रावली टॉडगढ़ वन्य जीव अभ्यारण्य- यह अभ्यारण्य अजमेर, पाली व राजसमंद जिलों में फैला हुआ है। इस अभ्यारण्य का कर्नल जेम्स टॉड के नाम पर रावली टॉडगढ़ अभ्यारण्य पड़ा।
  • गजनेर वन्य जीव अभ्यारण्य, बीकानेर - यह अभ्यारण्य बटबड़ पक्षी जिसे रेत का तीतर/इम्पीरियल सेंड ग्राउन्ज भी कहते है व जंगली सूअर के लिए प्रसिद्ध हैं। 
  • जयसमंद वन्य जीव अभ्यारण्य, उदयपुर - इसे जलचरों की बस्ती भी कहते है। इस अभ्यारण्य में बहोरा पक्षी की आश्रय स्थली, रूठी रानी का महल, स्थित है। यह सर्वाधिक बघेरों के लिए प्रसिद्ध है।

कनक सागर पक्षी अभयारण्य, बूंदी 

  • कनक सागर पक्षी अभयारण्य को "दुगारी पक्षी अभयारण्य" भी कहा जाता है।
  • यह अभयारण्य लगभग 72 किलोमीटर क्षेत्रफल में फैला हुआ है।
  • इसमें हंस, जलमुर्गी, गैरेट, सारस आदि वन्य जीव पाए जाते है।
  • यह अभयारण्य राज्य का सबसे छोटा आखेट निषिद्ध क्षेत्र है।

राजस्थान के प्रमुख मृगवन

राजस्थान में कुल 7 मृगवन है, जिनका विस्तृत वर्णन निम्न प्रकार है:-
  • संजय उद्यान मृगवन, जयपुर - यह राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 8 पर जयपुर के शाहपुरा के निकट स्थित है। इसकी स्थापना 1986 ईस्वी में की गयी। यहां पर नीलगाय, चिंकारा, चीतल आदि वन्य जीव-जंतु पाए जाते है।
  • अशोक विहार मृगवन, जयपुर - इसकी स्थापना 1986 में की गयी थी। यह जयपुर में विधानसभा भवन एवं सचिवालय के पास विकसित किया गया है।
  • माचिया सफारी मृगवन, जोधपुर - इसकी स्थापना 1985 में की गयी। यह मृगवन जोधपुर से 5 किलोमीटर दूर कायलाना झील के पास ही स्थापित है। इस पार्क में माचिया दुर्ग स्थित है। यहां पर राज्य एवं देश का प्रथम 'राष्ट्रीय मरु वानस्पतिक उद्यान' बनाया गया है। 
  • अमृता देव कृष्ण मृगवन, जोधपुर - यह मृगवन खेजड़ली गांव (जोधपुर) में अमृता देवी के नाम पर स्थापित किया गया।
  • चित्तौड़गढ़ मृगवन - इसकी स्थापना 1969 में की गयी। यह चित्तौड़गढ़ के दक्षिणी छोर की दीवारों के सहारे-सहारे फैला हुआ है।
  • पुष्कर मृगवन - इसकी स्थापना 1985 में पुष्कर (अजमेर) में की गयी।
  • सज्जनगढ़ मृगवन, उदयपुर - इसकी स्थापना 1984 में की गई। यह सज्जनगढ़ दुर्ग की तलहटी में फैला हुआ है। 

राजस्थान के प्रमुख जंतुआलय 

राजस्थान में कुल 5 जंतुआलय है, जिनका विस्तृत वर्णन निम्न प्रकार है:- 
  • जोधपुर जंतुआलय - इसकी स्थापना 1936 में जोधपुर में की गयी। यहां पर राजस्थान का राज्य पक्षी गोडावण का कृत्रिम प्रजनन केंद्र है। 
  • उदयपुर जंतुआलय - इसकी स्थापना 1878 ईस्वी में उदयपुर के गुलाबबाग में की गई थी। यहां पर एक पक्षीशाला विकसित की गई है।
  • जयपुर जंतुआलय - यह जंतुआलय राजस्थान एवं देश का सबसे प्राचीन जंतुआलय है। जयपुर जंतुआलय की स्थापना 1876 ईस्वी में जयपुर के रामनिवास बाग़ में महाराजा सवाई रामसिंह द्वारा की गयी थी। यहां पर मगरमच्छों एवं घड़ियालों का प्रजनन केंद्र है। यहां पर हाल ही में बाघों का प्रजनन भी किया गया है। 
  • बीकानेर जंतुआलय - इसकी स्थापना बीकानेर के सार्वजनिक उद्यान में 1922 में की गयी, जो वर्तमान में बंद है।
  • कोटा जंतुआलय - कोटा जंतुआलय की स्थापना 1954 ईस्वी में की गई थी। यह राजस्थान का सबसे नवीन जंतुआलय है। 

राजस्थान में आखेट निषिद्ध क्षेत्र

 आखेट निषिद्ध क्षेत्र - वे क्षेत्र जहाँ पर शिकार करना कानूनन अपराध है, आखेट निषिद्ध क्षेत्र कहलाते है। राजस्थान में कुल 33 आखेट निषेध क्षेत्रों को चिन्हित किया गया है। जोधपुर जिले में सर्वाधिक 7 आखेट निषिद्ध क्षेत्र है। आखेट निषिद्ध क्षेत्रों के नाम निम्न प्रकार है:- 
  • बागदड़ा – उदयपुर जिले में।
  • बज्जु – बीकानेर जिले में।
  • रानीपुरा - टोंक जिले में।
  • देशनोक – बीकानेर जिले में।
  • दीयात्रा – बीकानेर जिले में।
  • जोड़ावीर – बीकानेर जिले में।
  • मुकाम – बीकानेर जिले में।
  • डेचुं – जोधपुर जिले में।
  • डोली – जोधपुर जिले में काले हिरण के लिए।
  • गुढ़ाबिश्नोईयान – जोधपुर जिले में।
  •  जम्भेश्वर – जोधपुर जिले में।
  • लोहावट – जोधपुर जिले में।
  • साथीन – जोधपुर जिले में।
  • फिटकाशनी – जोधपुर जिले में।
  • बरदोद – अलवर जिले में।
  • जौड़ीया – अलवर जिले में।
  • धोरीमन्ना – बाड़मेर जिले में।
  • जरोंदा – नागौर जिले में।
  • रोतू – नागौर जिले में।
  • गंगवाना – अजमेर जिले में।
  • सौंखलिया- अजमेर जिले में गोडावण पक्षी के लिए।
  • तिलोरा – अजमेर जिले में।
  • सोरसन –  बारां जिले में गोडावण पक्षी के लिए।
  • संवत्सर-कोटसर - चुरू जिले में।
  • सांचौर – जालौर जिले में।
  • रामदेवरा – जैसलमेर जिले में।
  • कंवाल जी – सवाई माधोपुर जिले में।
  • मेनाल – चितौड़गढ़ जिले में।
  • महलां – जयपुर जिले में।
  • कनक सागर – बूंदी जिले में जलमुर्गो के लिए।
  • जवाई बांध – पाली जिले में।
  • संथाल सागर – जयपुर जिले में।
  • उज्जला – जैसलमेर जिले में।

राजस्थान के कंजर्वेशन रिजर्व स्थल

  • बीसलपुर कंजर्वेशन रिजर्व - टोंक।
  • जोहड़बीड़ गढवाला कंजर्वेशन रिजर्व - बीकानेर।
  • सुंधामाता कंजर्वेशन रिजर्व - जालौर, सिरोही।
  • गुढ़ा विश्नोइयान - कंजर्वेशन रिजर्व - जोधपुर।
  • शाकम्भरी कंजर्वेशन रिजर्व - सीकर, झुंझुनू।
  • गोगेलाव कंजर्वेशन रिजर्व - नागौर।
  • बीड़ कंजर्वेशन रिजर्व - झुंझुनू।
  • रोटू कंजर्वेशन रिजर्व - नागौर।
  • उम्मेदगंज पक्षी विहार कंजर्वेशन रिजर्व - कोटा।
  • जवाईबांध कंजर्वेशन रिजर्व - पाली।
  • जवाईबांध लेपर्ड कंजर्वेशन रिजर्व द्वितीय - पाली। 
आज की इस पोस्ट में राजस्थान के राष्ट्रीय उद्यान/अभ्यारण्य/पार्क, राजस्थान के वन्य जीव अभ्यारण्य, राजस्थान के आखेट निषिद्ध क्षेत्र, राजस्थान के कंजर्वेशन रिजर्व, राजस्थान के टाइगर रिजर्व, राजस्थान के जंतुआलय पर एक विस्तृत लेख लिखा गया है। इसमें आप सभी के सवाल राजस्थान के वन्य जीव अभ्यारण्य PDF Download, राजस्थान के राष्ट्रीय उद्यान ट्रिक, राजस्थान में वन्य जीव अभ्यारण्य कितने है उनके नाम, राजस्थान का सबसे छोटा सबसे बड़ा नवीनतम सबसे पुराना वन्य जीव अभ्यारण्य, राजस्थान के वन्य जीव अभ्यारण्य ट्रिक, राजस्थान के जंतुआलय ट्रिक, कंजर्वेशन रिजर्व ट्रिक आदि से सम्बंधित महत्वपूर्ण तथ्य शामिल किये गए है।
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