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राजस्थान की प्रमुख लोक कलाएँ एवं हस्तकलाएँ - Folk Arts and Handicrafts of Rajasthan in Hindi
राजस्थान की प्रमुख लोक कलाएँ एवं हस्तकलाएँ

पटचित्र, फड़

राज्य में देवी-देवताओं की गाथाओं को कपड़े पर बने चित्रों के माध्यम से बांचने की कला फड़ कहलाती है। फड़ चित्रांकन का प्रधान केन्द्र शाहपुरा (भीलवाड़ा) है, जोकि फड़ चित्रकला के कारण राष्ट्रीय स्तर पर पहचाना जाता है, यहां की छीपा जाति के जोशी फड़ में सिद्धहस्त है। लोक देवी-देवता के जीवन को कपड़े पर चित्रित करना चित्रांकन कहलाता है। फड़ चित्रण में फड़ के केन्द्रीय भाग में मुख्य देवता का चित्र अंकित किया जाता है। सम्बंधित देवी-देवता के जन्म, शिक्षा, विवाह, युद्ध, तथा मृत्यु को चित्रों के माध्यम से दर्शाया जाता है। फड़ का मुख्य पात्र लाल एवं हरे रंग की पोशाक से दर्शाया जाता है। भोपा तथा भोपी इस फड़ का वाचन सम्बंधित वाद्य यंत्र साथ करते है। विभिन्न फड़ निम्न प्रकार है :- 
  • देवनारायण जी की फड़ - देवनारायण जी की फड़ राजस्थान की सबसे लम्बी लोकगाथा एवं सबसे अधिक चित्रांकन वाली फड़ है। यह फड़ बांचते समय जन्तर नामक वाद्य यंत्र का प्रयोग किया जाता है। इस फड़ का वाचन गुर्जर जाति के अविवाहित भोपा-भोपी द्वारा किया जाता है। यह राज्य की सर्वाधिक प्राचीन चित्रकला है। इस फड़ का वचन रात्रि के समय किया जाता है। 1992 ई. में भारतीय डाक विभाग ने देव नारायण जी की डाक टिकट जारी किया
  • पाबुजी की फड़ - इस फड़ का वाचन नायक या आयडी जाति के भौपों-भोपियों द्वारा रात्रि के समय किया जाता है। पाबूजी की फड़ सबसे लोकप्रिय फड़ है। इस फड़ के वाचन में रावणहत्था नामक वाद्यययंत्र का प्रयोग किया जाता है। ऊंट के बीमार होने पर इस फड़ का वाचन किया जाता है। इस फड़ में पाबूजी की घोड़ी को काले रंग से चित्रित किया जाता है तथा फड़ के मुख के सामने भाले का चित्र होता है। 
  • रामदेव जी की फड़ - रामदेव जी की फड का वाचन कामड़ जाति के भोपा-भोपी द्वारा किया जाता है। इस फड़ को बांचने में रावणहत्था नामक वाद्य यंत्र का प्रयोग किया जाता है। रामदेवजी की फड़ का सर्वप्रथम चित्रांकन चौथमल चितेरे ने किया था।
  • रामदला व कृष्णदला की फड़ - यह फड़ हाडौती क्षेत्र में सर्वाधिक प्रचलित है। इस फड़ का वाचन दिन के समय बिना वाद्य यंत्र का प्रयोग किये  भाट जाति के भोपों द्वारा किया जाता है। 
  • भैंसासुर की फड़ - इस फड़ का वाचन नहीं होता है, केवल दर्शन किए जाते हैं। यह फड़ बावरी या बागरी जाति में लोकप्रिय है। चोरी करने से पूर्व इस जाति के लोग इस फड़ के दर्शन एवं पूजा कर शगुन लेते है।
  • अमिताभ की फड़ - इस फड़ का निर्माण भोपा रामलाल व भोपी पताशी ने किया, जिसमे इन्होने अमिताभ बच्चन को एक डॉक्यूमेंट्री में लोकदेवता के रूप में प्रदर्शित किया है।

माण्डणा

माण्डणे :- मांगलिक अवसरों पर विभिन्न रंगो के माध्यम से घर-आँगन उकेरी गई कलात्मक आकृतियां माण्डणे कहलाती है। इन मांडणे को गुजरात में 'सातियाँ', बंगाल में 'अल्पना', महाराष्ट्र में 'रंगोली', भोजपुरी अंचल में 'थापा', उत्तर प्रदेश में 'चौक पूरना या सोन', केरल में 'अतापु', बिहार में 'अहपन', तमिलनाडु में 'कोलम', ब्रज एवं बुंदेलखंड में 'साँझा' कहलाते है। कुछ विशेष मांडणे निम्न प्रकार है:-
  • पगल्या मांडणा - दीपावली के समय लक्ष्मी पूजन से पूर्व आराध्य देवी के घर में आगमन के रूप में पगल्ये (पद चिह्न) बनाए जाते है। राजस्थान में मांडणे में इनका चित्रण सर्वाधिक होता है।
  • ताम मांडणा - विवाह के अवसर पर लग्न मंडप के समय बनाया जाता है। यह दाम्पत्य जीवन में सुख शांति का प्रतीक माना जाता है।
  • चौकड़ी मांडणा - होली के अवसर पर बनाए गए इस मांडणे में चार कोण होते है, जो चारों दिशाओं में खुशहाली का प्रतीक माने जाते है।
  • थापा मांडणा - मांगलिक अवसरों पर महिलाओं द्वारा घर की चैखट पर कुमकुम तथा हल्दी से बनाए गये हाथों के निशान थापे कहलाते है।
  • मोरड़ी माण्डणा - राजस्थान में मीणा जनजाति की महिलाओं द्वारा घर-आँगन में बनाई गई मोर की आकृति (चित्रण) मोरड़ी माण्डणा कहलाती है। मोर को खुशहाली तथा समृद्धि का प्रतीक माना जाता है
  • सातिया या साट्या मांडणा - यह मांडणा बच्चों के जन्म के अवसर पर बनाया जाता है। ग्रामीण महिलाऐं विभिन्न आकारों में दरवाजों की चौखट के चारों तरफ बनाती है। इस मांडना को उत्तरी व पश्चिमी राजस्थान में सांखिया तथा पूर्वी राजस्थान में सातिया कहते है।

काष्ठ कला

  • कठपुतली - किसी व्यक्ति के पात्र को लकड़ी के ढांचे के रूप में प्रस्तुत करना। इसका मंचन नट या भाट जाति लोगों द्वारा किया जाता है। भारतीय लोक कला मण्डल, उदयपुर कठपुतली कला के विकास के लिए कार्यरत है।
  • बेवाण - लकड़ी के बने देव विमान, जिनकी देव झुलनी एकादशी को जुलुस के साथ सवारी निकलती है और भाद्र शुक्ल एकादशी (देव झुलनी एकादशी) के दिन किसी तालाब के किनारे ले जाकर नहलाया जाता है।
  • चौपड़ा - लकड़ी से निर्मित चार अथवा छः खाने युक्त मसाले रखने का पात्र जिसे पश्चिमी राजस्थान में हटड़ी कहते है। इसका विवाह या मांगलिक अवसर पर कुमकुम, अक्षत, चावल आदि रखने में भी प्रयोग किया जाता है।
  • कावड़ - कपाटों युक्त लकड़ी से निर्मित खुलने एवं बंद होने वाली मंदिरनुमा आकृति जिसे चलता फिरता देवधर या रामजी की कावड़ भी कहा जाता है। इसके विभिन्न कपाटों पर पौराणिक कथाओं का चित्रण किया जाता है। कावडिये भाट द्वारा पौराणिक कथाओं का वाचन करने के साथ-साथ इसके विभिन्न कपाट खुलते जाते है। कावड़ का निर्माण बस्सी (चित्तौड़गढ़) निवासी खैरादी जाति के लोगों द्वारा किया जाता है, इसे लखारी-लाल रंग से रंगा जाता है। मांगीलाल मिस्त्री प्रसिद्ध कावड़ निर्माता है।
  • तौरण - विवाह के अवसर पर दूल्हे के दुल्हन के घर प्रवेश पर दुल्हन के घर के मुख्य प्रवेश द्वार पर जो लकड़ी की कलाकृति लटकाई जाती है, उसे तौरण कहते है। तौरण पर सामान्यतः मयूर या सुग्गा की आकृति अंकित होती है। तौरण शौर्य अथवा विजय का प्रतीक माना जाता है।
  • बाजौट - लकड़ी कीचौकी जिसे भोजन के समय थाली के नीचे अथवा पूजा के समय प्रयुक्त किया जाता है।
  • खाण्डा - बस्सी के खेराद जाति के लोगो द्वारा लकड़ी से निर्मित तलवारनुमा आकृति जिसका उपयोग रामलीला नाटक में तलवार के स्थान पर किया जाता है, खाण्डा कहलाती है। गुलाबी रंग से रंगा खाण्डा शौर्य का प्रतीक माना जाता है।

राजस्थान की अन्य प्रमुख लोक कलाएँ

  • देवरा - देवरे खुले चबूतरे पर त्रिकोणाकार में निर्मित होते है। ग्रामीण क्षेत्रों में लोकदेवताओं के चबुतरेनुमा थान "देवरा" कहलाते है।
  • पथवारी - गांव  पथरक्षक के रूप में पूजे जाने वाले स्थल को पथवारी कहा जाता है।
  • सांझी - यह राजस्थानी कन्याओं का एक रंगीन व्रतोत्सव है, इसमें ग्रामीण क्षेत्रों में कुवांरी कन्याओं द्वारा अच्छे वर की कामना हेतू दीवार पर उकेरे गए रंगीन भित्ति चित्र सांझी कहलाते है। राजस्थान में सांझी बनाने की परम्परा वृंदावन से आयी। सांझी पर्व श्राद्ध पक्ष से दशहरे तक मनाया जाता है। केले की सांझी (कदली पत्तों की सांझी) के लिए श्री नाथ मंदिर (नाथ द्वारा) प्रसिद्ध है।
  • पिछवाई -  नाथद्वारा का श्रीनाथ मंदिर पिछवाई कला के लिए प्रसिद्ध है। नाथद्वारा के जांगिड़ एवं गौड़ ब्राह्मण जाति के परिवार पिछवाई चित्रण करते है।
  • पावे - कागज पर लोक  देवी-देवता का चित्रण।
  • वील - राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्रों में छोटी-मोटी चीजों को संग्रहित करके रखने के लिए मिट्टी की बनाई गई महलनुमा आकृति वील कहलाती है।
  • मेहन्दी महावर - इसको नारी सौंदर्य प्रसाधनो में गिना जाता है। मांगलिक अवसरों पर महिलाओं तथा युवतियों द्वारा हाथों तथा पैरों पर मेहन्दी लगाने की परम्परा है। मेहन्दी को सुहाग व सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। राजस्थान में सोजत (पाली) की मेहन्दी प्रसिद्ध है। बूढ़ी महिलाएं हथेली पर पांच बड़े आकार की गोल बिन्दियां बनाती है, जिसे "पांचोटा" कहते है।
  • बटेवड़े - गोबर से निर्मित सुखे उपलों को वर्षा आदि से सुरक्षित रखने के लिए उन्हें चौकोर अथवा आयताकार व्यवस्थित कर इस ढेर को पुन: गोबर से लीपकर बनाई गई आकृति बटेवड़े कहलाती है।
  • मोण/मुण - पश्चिमी राजस्थान में मिट्टी से बने मटके जिनका मुंह छोटा होता है, जिनका उपयोग पानी के लिए किया जाता है, मोण कहलाते है।
  • गोदना - गरासिया जनजाति की अंग चित्रांकन की मुख्य प्रथा ,है जिसमें सुई अथवा बबूल के कांटे से मानव शरीर पर विभिन्न आकृत्तियां उकेरी जाती है। इसमें घाव को कोयला अथवा खेजड़ी की पतियों के पाउडर से भरा जाता है। पाउडर खून को सोख लेता है और सुखने के बाद आकृति हरे रंग में उभर जाती है।
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