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जैव विकास एवं जैव विकास के प्रमाण

आज की इस पोस्ट में जैव विकास एवं जैव विकास के प्रमाण पर अति महत्वपूर्ण नोट्स दिए गए हैं। आप इनको पूरा जरू पढ़े:-

जैव विकास एवं जैव विकास के प्रमाण

जैव विकास के सिद्धान्त एवं इसके प्रमाणों की उपलब्धता के कारण सभी वैज्ञानिक इससे सहमत हैं कि जीवों का विकास कालान्तर में हुआ है तथा यह सतत् प्रक्रिया है जो आज भी क्रमिक रूप से चालू है। ये प्रमाण निम्नलिखित हैं जो प्रमाणित करते हैं की जीवों का विकास क्रमबद्ध रूप से हुआ है।

वर्गीकरण से जैव विकास के प्रमाण

 समान रचना एवं आकार वाले जीवों को एक वर्ग में रखा गया है। जैसे-
  • मछलियां पिसीज वर्ग में। 
  • मेंढ़क एम्फीबिया वर्ग में (जल व थल दोनों पर रहने वाले जीव) 
  • रेंगने वाले जीव रेप्टेलिया वर्ग
  • उड़ने वाले पक्षियों को एवीज वर्ग में 
  • स्तनधारियों को मैमेलिया वर्ग में
परन्तु इन सभी जीवों में मेरूदण्ड़ पाई जाती है इन सभी जीवों को पृष्ठवंशी (कोर्डेटा) कहा जाता है। इससे स्पष्ट है कि इन जीवों की उत्पत्ति समान पूर्वज से हुई है।

तुलनात्मक शरीर रचना का प्रमाण 

जैसे-व्हेल मछली,चमगादड़, कुत्ता व मनुष्य स्तनधारी है।
  1. समजात अंग : वे अंग जिनकी आन्तरिक रचना समान परन्तु बाह्य संरचना एवं कार्य भिन्न-भिन्न होते हैं समजात अंग कहलाते हैं। जैसे- व्हेल के अग्रपाद तैरने में, चमगादड़ व पक्षी के अग्रपाद उड़ने में, कुत्ते के अग्रपाद चलने में, मनुष्य के अग्रपाद वस्तु को पकड़ने में।
  2. समवृत्ति अंग : वे अंग जिनकी उत्पत्ति एवं आन्तरिक संरचना भिन्न हो परन्तु बाह्य संरचना व कार्य समान हों। जैसे-कीट के पंख (शरीर की भित्ति का), पक्षी के पंख (अग्रपाद का रूपान्तरण है) एवं चमगादड़ के पंख (अग्रपाद की हड्डियों की झिल्ली से बनते हैं)।
  3. अवशेषी अंग : जो अंग किसी जीव के पूर्वजों में विकसित थे एवं कार्यशील थे परन्तु जैव विकास की प्रक्रिया के दौरान इनकी उपयोगिता धीरे-धीरे कम होती गई तथा अब ये मात्र अवशेष के रूप में ही पाये जाते हैं। जैसे- मानव शरीर में अवशेषी अंग एपेन्डिक्स, कर्ण पेशिया, आंख में निमेषक पटल, शरीर पर बाल , नुकिले रदनक दांत, पुच्छ कशेरूका (रीढ़ की हड्डी का सबसे निचला एवं अन्तिम हिस्सा)। नवजात शिशु में कभी-कभी बन्दर एवं पशुओं की तरह पुच्छ पाई जाती है जिससे प्रमाण मिलता है कि हमारे पूर्वज बन्दर थे।

तुलनात्मक ध्रुणिकी से प्रमाण

  • सभी पृष्ठ वंशीय जैसे मछली, मेढ़क, सरीसर्प, पक्षी एवं मैमल्स तक में अल्पआयु भ्रूण (प्रारम्भिक अवस्था में भूण) लगभग एक समान होते हैं इससे ये सिद्ध होता है कि इनके पूर्वज एक समान रहे होगें।
  • इस हेतु हेकल का पुनरावर्तन सिद्धान्त प्रसिद्ध है कि प्रत्येक जीव अपने परिवर्धन काल में अपने पूर्वजों के इतिहास को दोहराता है।

योजक कड़ियों से जैव विकास का प्रमाण

  • कुछ ऐसे जीव जिनमें दो अलग-अलग वर्गों एवं जातियों के लक्षण पाये जाते हैं ऐसे जीवों को योजक कड़ी कहते हैं। ये जीव दो वर्गों के विकास क्रम को एक दूसरे से जोड़ते हैं।
  • सजीव व निर्जीव :– वाइरस । ATP (निर्जीव का लक्षण) का निर्माण नहीं, वृद्धि नहीं तथा Multiplication (सजीव का लक्षण) बहुगुणन करता है।
  • पादप व जन्तु :– युग्लिना। ग्लाइकोजन के रूप में भोजन का संग्रह जन्तु का लक्षण एवं हरित लवक का पाया जाना पादप जगत का लक्षण है। ऐनेलिडा एवं आर्थोपोडा के बीच की योजक कडी पेरीपेट्स हैं इसमें दोनों संघों के गुण पाये जाते हैं।
  • डकबिल प्लेटीपस, एकिडना :- पक्षी तथा स्तनधारी के बीच। अण्डे देना तथा शरीर पर बाल व दुग्ध ग्रन्थियां ।
  • फुफ्फुस मछली :- पिसिज व एम्फीबिया के बीच योजक कड़ी।
  • आर्किओप्टेरिक्स :- सरीसर्प (रेप्टाइल्स) एवं पक्षियों (एवीज) के बीच योजक कड़ी। इसमें सरीसर्पो की तरह चोंच में दाँत पाये जाते हैं तथा पक्षियों की तरह चोंच एवं पंख पाये जाते हैं। यह वर्तमान में नहीं पाया जाता है। इसके जीवाश्म (मृत) खोजे गये हैं। वाइरस, युग्लिना, पेरीपेटस, डकबिल प्लेटीपस (एकिडना), फुफ्फुस मछली ये सभी जीवित जीवाश्म भी कहलाते हैं।

जीवाश्मीय प्रमाण

  • डार्विन ने जीवाश्मों को जैव विकास का ठोस प्रमाण माना। घोड़े के विकास क्रम – इसकी आकार, आकृति, पंजों के प्रकार में निरन्तर परिवर्तन से आज का घोड़ा बना है।

प्राणी भौगोलिक वितरण का प्रमाण

  • ऑस्ट्रेलिया में पाया जाने वाला कंगारू,धुर्वीय भालू एवं न्यूजीलैण्ड के पेंग्विन आदि महाद्वीपों के पृथक् होने से विशेष क्षेत्र में ही पाये जाते हैं।

जैव रासायनिक प्रमाण

  • प्रत्येक जीव का जीवद्रव्य मुख्यत प्रोटीन, जल, वसा, काबोहाइड्रेट से बना होता है। सभी जीवों में समान कार्य के लिये एक जैसे एन्जाइम पाये जाते हैं। जैसे- अमीबा में व मानव में लाइपेज वसा का ही पाचन करता है। 
  • हार्मोन- सभी पृष्ठवंशीयों की अन्तःस्रावी ग्रन्थियों से निकले हार्मोन समान होते हैं।

कार्यिकी से जैव विकास के प्रमाण

  • सूक्ष्म जीव अमीबा से लेकर मानव तक में पाचन, उत्सर्जन, श्वसन आदि क्रियाए होती हैं।

आनुवंशिकी से प्रमाण

  • समान जीवों में गुणसुत्रों की संख्या लगभग समान होती है। जैसे मानव में 46 व चिम्पाजी में 48 
  • औतिकी प्रमाण (उत्तकों का अध्ययन) मछली से मानव तक के हृदय की रचना में क्रमिक विकास प्रमाणित होता है। जैसे मछली- एक आलिन्द एक निलय, मेढ़क-दो आलिन्द एक निलय, मनुष्य-दो आलिन्द तथा दो निलय।
  • जैव विकास धीमी तथा निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है एक जाति से दूसरी जाति बनने में लाखों वर्ष लग जाते हैं इसलिए हम इन परिवर्तनों को देख नहीं पाते हैं। विकास का यह क्रम आज वर्तमान में भी जारी है एवं भविष्य में भी जारी रहेगा।

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जीव विज्ञान आधारभूत परिचय
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