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जीव विज्ञान आधारभूत परिचय

आज की इस पोस्ट में जीव विज्ञान के अति महत्वपूर्ण टॉपिक "जीव विज्ञान  का सामान्य परिचय" पर विस्तार से एक अति महत्वपूर्ण नोट्स दिए गए है। आप इनको पूरा जरूर पढ़ें:-


जीव विज्ञान : सामान्य परिचय

जीव विज्ञान (Biology) :- विज्ञान की एक शाखा है जिसमें सभी जीव धारीयों का अध्ययन किया जता है। जीव विज्ञान निम्न शब्दों से बना है :- Bios → जीवन + Logos → अध्ययन। जीव विज्ञान शब्द लेमार्क एवं ट्रेविरेनस वैज्ञानिक ने दिया।
विज्ञान (Science) :- प्रकृति के क्रमबद्ध अध्ययन से अर्जित एवं प्रयोगों द्वारा प्रमाणित वर्गीकृत ज्ञान ही विज्ञान है। किसी भी चीज का क्रमबद्ध एवं योजनाबद्ध तरीके से अध्ययन करना ही विज्ञान कहलाता है।
  • अरस्तु को जीव विज्ञान का जनक कहा जाता है।
  • अरस्तु ही जन्तु विज्ञान का जनक भी है।
  • पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति कब और कहां हुई। कुछ लोगों का मत था कि निर्जीव पदार्थों से ही जीव स्वतः उत्पन्न होते हैं कुछ का मत था कि जीव बाहर से पृथ्वी पर आये हैं। वर्तमान में मत है कि रासायनिक पदार्थों के मिलने से ही प्रथम जीव की उत्पत्ति हुई है।
  • जीवन की दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण अकार्बनिक यौगिक जल है।
  • कोशिका की दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्बनिक पदार्थ प्रोटीन है।
  • विश्व के सभी धर्म ईश्वर को सृष्टि का रचियता मानते हैं।
  • प्रोफेसर जे.बी.एस. हॉल्डेन ने आठ चरणों में पृथ्वी पर जीव की उत्पत्ति को समझाया।
  • पृथ्वी पर सर्वाधिक मात्रा में पाया जाने वाला कार्बनिक पदार्थ सेलुलोज है जोकि पादप कोशिका की कोशिका भित्ति (cell wall) का मुख्य संघटक यौगिक है (कोशिका झिल्ली का नहीं)।
  • कोशिका झिल्ली (Cell Membrane) पादप कोशिका एवं जन्तु कोशिका दोनों में पाई जाती है जबकि कोशिका भित्ति केवल पादप कोशिका में ही कोशिका झिल्ली के बाहर पायी जाती है।

जीवन की अवधारणा के सिद्धांत

सबसे पहले ग्रीक दार्शनिकों एवं अरस्तु नामक वैज्ञानिक ने बताया कि जीवों (सजीवों) की उत्पत्ति निर्जिवों से हुई है। इसे स्वतः जनन मत भी कहते हैं।जीवन की उत्पति के विभिन्न सिद्धांत निम्न प्रकार है:-

जीवात्-जीवोत्पत्ति का सिद्धान्त:-

  • इटली के वैज्ञानिक फ्रांसिस्को रेड्डी ने दिया उन्होंने सर्वप्रथम प्रयोग द्वारा सिद्ध किया की निर्जीव पदार्थ से जीव की उत्पत्ति नहीं हो सकती। इस प्रकार इन्होंने अरस्तु के मत का खण्डन किया।
  • लुई पाश्चर ने भी रेड्डी के मत का समर्थन प्रयोग द्वारा सिद्ध Concept of oparin (ओपेरिन का सिद्धान्त) 1924 में इस रूसी वैज्ञानिक ने 'Origin of life' नाम की पुस्तक लिखी। पृथ्वी पर प्रथम जीव की उत्पत्ति को समझाने का प्रयास किया। ऐसी ही परिकल्पना अंग्रेज वैज्ञानिक जे.बी.एस. हॉल्डेन ने 1929 में प्रस्तुत की इसके अनुसार पृथ्वी की उत्पत्ति से लेकर प्रथम जीवन की उत्पत्ति की पूरी प्रक्रिया को 8 चरणों में बांटा गया।
  • ओपेरिन की परिकल्पना को स्ट्रेनले मिलर के प्रयोग से सिद्ध ओपेरिन के अनुसार रासायनिक पदार्थों के मिलने से प्रथम जीव की उत्पत्ति हुई इसी परिकल्पना को यूरे तथा स्टनले मिलर नामक वैज्ञानिक ने एक प्रयोग द्वारा सिद्ध किया।
  • पृथ्वी का प्रारम्भिक वायुमण्डल अपचायक जल था इसमें हाइड्रोजन का बाहुल्य था, जीवन की उत्पत्ति के समय Oस्वतंत्र रूप से वायुमण्डल में अनुपस्थित थी।

स्टनले मिलर का प्रयोग

  • स्टनले मिलर ने पृथ्वी के प्रारम्भिक वायुमण्डल में उपस्थित पदार्थों मिथेन गैस, हाइड्रोजन, जलवाष्प, अमोनिया व टंगस्टन के विद्युतायों द्वारा चिन्गारी की व्यवस्था की जिसमें अमीनो अम्ल, सरल शर्करा, कार्बनिक अम्ल व अन्य कार्बनिक यौगिक बने जो की ओपेरिन के रासायनिक विकास अथवा जीव-रसायन उदभव (रासायनिक सिद्धान्त) को सिद्ध करता है।
  • ओपेरिन की परिकल्पना के अनुसार पृथ्वी पर सबसे पहले रासायनिक विकास हुआ जिनसे जीव के लिये आवश्यक पदार्थों का निर्माण हुआ सबसे पहले कोशिका सदृश्य विषाणु बना। विषाणु से एक कोशिकीय जीव बने फिर इनसे बहुकोशिकीय जीव बने।

तत्वों का रासायनिक एवं जैविक विकास

पृथ्वी पर आरम्भिक काल में उपस्थित तत्व - C, H, O, N इनके रासायनिक संयोग से मेथेन, जल, अमोनिया का निर्माण हुआ। पृथ्वी पर उपस्थित तत्वों C, H, O, N की आपस में भौतिक एवं रासायनिक क्रियाओं से रासायनिक विकास तथा जैविक विकास निम्न प्रकार हुआ:-
  1. रासायनिक विकास :- अमीनो अम्ल, शर्करा, वसा अम्ल का निर्माण । न्यूक्लिक अम्ल, प्रोटीन, वसा का निर्माण। DNA से पहले RNA का निर्माण हुआ। न्यूक्लियो प्रोटीन का निर्माण (यही विषाणु की उत्पत्ति का आधार बना)।
  2. जैविक विकास :- पृथ्वी पर सर्वप्रथम विषाणु की उत्पत्ति हुई एक कोशिकीय जीव की उत्पत्ति। बहुकोशिकीय जीव की उत्पत्ति (नील हरित शैवाल जो पहला प्रकाश संश्लेषी जीव माना जाता है)।

जैव विकास

सर्वप्रथम शब्द हरबट स्पेन्सर ने दिया। सरलतम संरचना वाले सजीव में जटिल संरचना वाले जीवों में क्रमिक परिवर्तन को ही जैव विकास कहते हैं। जैव विकास Organic Evolution का जनक एम्पीडोक्लीज को मानते हैं।

जैव विकास के प्रमुख सिद्धान्त

Major Theories of Evolution :- जैव विकास के प्रमुख सिद्धांत की बात करें तो ये निम्नानुसार है:-

लैमार्क वाद या उपार्जित लक्षणों की वंशानुगति का सिद्धान्त:-

  • सन् 1809 में फ्रांसिसी वैज्ञानिक डी. लैमार्क ने उनकी पुस्तक 'फिलोसोफिक जुलोजिक' में इस सिद्धान्त को प्रतिपादित किया।
  • इसके अनुसार वातावरण आश्यकता एवं उपयोग के आधार पर प्राणियों की संरचना में परिवर्तन हो सकते हैं तथा धीरे-धीरे ये परिवर्तन एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में वंशानुगत हो जाते हैं तथा नई जाति का विकास होता है।
  • प्रमाण पक्ष में :- सर्प की टांगों का लुप्त होना। जिराफ की गर्दन का लम्बा होना ऊंचे पेड़ों की पत्तियों पर निर्भर रहने का कारण सम्भव हुआ।
  • सिद्धान्त का खण्डन :- भारत में सदियों से कान व नाक छेदे जाते हैं परन्तु यह लक्षण वंशानुगत नहीं हुआ। विजमैन नामक वैज्ञानिक ने किया। चूहों की 20-22 पीढ़ीयों की पूंछ काट देने पर भी पूंछ समाप्त नहीं हुई।
  • निष्कर्ष :- सभी उपार्जित लक्षण या वातावरणीय विभिन्नताएं वंशानुगत नहीं होती अर्थात् एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में नहीं जाती है।

प्राकृतिक वरण का सिद्धान्त या डार्विनवाद :-

  • 1859 में चार्ल्स डार्विन ने प्राकृतिक चयन द्वारा Origera of Species (जाति की उत्पत्ति) नामक पुस्तक में इस सिद्धान्त को बताया। इस सिद्धान्त के अनुसार- विभिन्नता तथा अनुकुल लक्षणों के वंशानुगत हो जाने से प्रत्येक पीढ़ी अपने पूर्वजो से विकसित सुगठित एवं भिन्न होती है तथा धीरे-धीरे नई जाति का विकास होता है। प्रकृति के अनुकुल परिस्थितियों में ही जीव जीवन संघर्ष में जीवित रहते हैं।

डार्विन के प्रमुख विचार निम्न हैं- 
  • सन्तानोत्पत्ति की प्रचुर क्षमता
  • जीवन संघर्ष- अन्तःजातीय, अन्तराजातीय तथा वातावरणीय
  • विभिन्नताएं 
  • योग्यतम का वरण 
  • अनुकुल लक्षणों की वंशानुगति 
  • नई जाति की उत्पत्ति।

संश्लेषण वाद या नवडार्विनवाद

जैव विकास का आधुनिक सिद्धान्त है। इसके अनुसार विकास (जैव विकास) की घटनाएं उत्परिवर्तन तथा आनुवंशिक पुनः संयोजन द्वारा होती है। वातावरण के प्रभाव से उत्पन्न गुण आनुवंशिक नहीं होते तथा ये उस जीव के साथ ही नष्ट हो जाते हैं केवल आनुवंशिकी के द्वारा विकसित गुण ही एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जाते हैं। विकिरणों के कारण जीवों में जीन्स में उत्परिवर्तन होता है जिससे नये गुणों का विकास होता है।

उत्परिवर्तनवाद

हॉलेण्ड के वैज्ञानिक ह्यगो डी ब्रीज ने दिया। इसके अनुसार कुछ पादपों तथा जन्तुओं में क्रमिक विकास नहीं होता वरन् उनमें अकस्मात् ही परिवर्तन हो जाते हैं जीन की संरचना में आये ये परिवर्तन एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में चले जाते हैं एवं अचानक नई जाति का उदय होता है।
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